दुर्ग . महिलाओं में आर्थिक स्वतंत्रता के मायने घर-परिवार और कार्यक्षेत्र के हिसाब से बदलते जाते है। अर्थिक आजादी से हम खुद को कितना मजबूत और परिवार को सशक्त बनाते है।यह एक बडा सवाल है। महिलाएं जब खुद पर खर्च करती भा है तो वह एक बार परिवार के मुखिया से जरूर पूछती है। इसका मतलब यह नही होता कि वह निर्णय लेने में सक्षम है बल्कि यह पूछने की परंपराऔर उनके प्रति सम्मान है ... अब जमाना है कि महिलाएं शॉपिंग कर घर पहुंचती है और बताती है कि यह मैने अपने लिए किया। स्वामी स्वारूपानंद कॉलेज के सभागार में हुई पत्रिका भिलाई के वीमंस कोर्ट में ऐसे कई सवालों के जवाब कोर्ट के जूरी मेंबर ने दिए जो महिलाएं जानना चाहती थी।दो घंटे चली महिलाओं की इस अदालत में महिलाओं ने कुछ अपने अनुभव सात्रा किए तो कई ने अपने दिल की बात सभा के बीच रखी।
वीमंस कोर्ट में फैसला करने बैठी पद्मश्री शमशाद बेगम,एएसपी सुरेशा चौबे, साइकोलॉजिस्ट एंव शिक्षाविद डॉ.ममता शुक्ला,पुलिस काउंसिलर डॉ.मणिमेखला शुक्ला एंव शिक्षाविद् डॉ.हंसा शुक्ला ने सारे मुद्दों को सुनने के बाद अपना फैसला सुनाया कि आर्थिक जिम्मेदारी को खुलकर निभाने पहले महिलाओं को शिक्षित होना पड़ेगा तब कहीं जाकर वे अपने अधिकार को पा सकती है।

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