भिलाई नगर निगम: बीस साल में पहली बार शहर सरकार के सियासी पटल से नदारत रहा विपक्ष, पढि़ए चुनावी काउंट डाउन

भिलाई नगर निगम की वर्तमान परिषद का कार्यकाल वैसे तो अब समाप्ति पर है, लेकिन 20 साल में ऐसा पहली बार है जब शहर सरकार के सियासी पटल पर विपक्ष की कोई मौजूदगी नहीं दिखी है।

By: Dakshi Sahu

Published: 19 Jan 2021, 04:43 PM IST

भिलाई. भिलाई नगर निगम की वर्तमान परिषद का कार्यकाल वैसे तो अब समाप्ति पर है, लेकिन 20 साल में ऐसा पहली बार है जब शहर सरकार के सियासी पटल पर विपक्ष की कोई मौजूदगी नहीं दिखी है। सांवला राम डाहरे की अगुवाई वाला ( संगठन में फेरबदल हाल ही मेंं हुआ है) भाजपा जिला संगठन खामोश रहा। पार्टी द्वारा मनोनीत नेता प्रतिपक्ष रिकेश सेन भी सीन से पूरी तरह गायब रहे। निगम के इससे पहले के तीनों कार्यकाल में विपक्ष की असरदार भूमिका देखने का मिलती रही है। चाहे भाजपा विपक्ष में रही हो या कांग्रेस। साडा के विघटन के बाद पहली बार अस्तित्व में आए नगर निगम का नेतृत्व कांग्रेस की नीता लोधी के हाथों में रहा। तब शुरू के तीन साल प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता थी और राज्यमंत्री के रूप में बदरुद्दीन कुरैशी का संरक्षण। तब भी यहां चुनकर सदन में पहुंचे भाजपा के युवा पार्षद नेता प्रतिपक्ष जे. संजय दानी और उप नेता प्रतिपक्ष जया रेड्डी के नेतृत्व में कांग्रेस की अपनी मर्जी कभी चलने नहीं दी।

पार्षदों को कर दिया साइड
दूसरे कार्यकाल में निगम में भाजपा की सत्ता रही और कांग्रेस विपक्ष में। तब भी नेता प्रतिपक्ष को लेकर कांग्रेस में सहमति नहीं बन पाने के बावजूद सीजू एंथोनी और सुभद्रा सिंह विपक्ष की कमान संभाले रहे। तीसरी बार में फिर कांग्रेस की निर्मला यादव महापौर बनीं। उस समय नेता प्रतिपक्ष को लेकर भाजपा में विवाद रहा। संगठन ने हेमंत निषाद का नाम तय कर दिया था, लेकिन बाद में गुटबाजी हावी हो गई, लेकिन तब भी बिना नेता प्रतिपक्ष के तथ्यों और तर्को पर खूब बहस होती और ऐसे कई मौके आए जब सत्तापक्ष के प्रस्ताव गिर गए। इस चौथे कार्यकाल में संगठन ने नेता प्रतिपक्ष की बागडोर रिकेश सेन को सौंपी थी। शुरुआत में रिकेश काफी आक्रामक भी रहे। पार्षद भी उनके नेतृत्व में शहर सरकार पर नकेल डाल रही थी। लेकिन अचानक नेता प्रतिपक्ष और पार्षदों को साइड कर भाजपा जिला संगठन ने हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया।

...आखिर विपक्ष के इस तरह आत्मसमर्पण की वजह क्या है?
तब से विपक्षी खेमा मानो सन्निपात की स्थिति में पड़ा रहा। खामोशी के लिए भाजपा के एक शीर्ष नेता और निगम सरकार के बीच गठबंधन की चर्चा भी तब से होती रही है। इस बीच एक सार्वजनिक संगठन श्रीराम जन्मोत्सव समिति जिसका निगम की राजनीति से कोई सरोकार नहीं था, ने निगम सरकार की कथित गड़बडिय़ों पर हल्ला मचाना शुरू किया और शहर की जनता उससे जुड़ती भी गई। पखवाड़े भर चले मुक्ति अभियान और उसके समापन में स्वस्फूर्त भीड़ भी उमड़ी। ऐसे में भाजपा संगठन की गतिविधियां सवालों के घेरे में है। एक स्वाभाविक सवाल है कि आखिर विपक्ष के इस तरह आत्मसमर्पण की वजह क्या है?

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Dakshi Sahu Desk/Reporting
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