मिलिए अपने हक के लिए लडऩा सिखाने वाली भिलाई की पोलम्मा से, इन्होंने आत्मनिर्भरता से बदली है कई महिलाओं की जिंदगी

इस्पात नगरी भिलाई के श्रमिक बाहुल्य क्षेत्र कैंप-1 में महिला को पति ने सताया हो, ससुराल वाले परेशान कर रहे हों या बच्चों के हक की बात हो.. बी. पोलम्मा हर जगह उनका साथ देने के लिए खड़ी हो जाती हैं।

By: Dakshi Sahu

Updated: 22 Nov 2020, 01:12 PM IST

कोमल धनेसर @भिलाई. इस्पात नगरी भिलाई के श्रमिक बाहुल्य क्षेत्र कैंप-1 में महिला को पति ने सताया हो, ससुराल वाले परेशान कर रहे हों या बच्चों के हक की बात हो.. बी. पोलम्मा हर जगह उनका साथ देने के लिए खड़ी हो जाती हैं। वे 90 के दशक में शिक्षादूत बनकर साक्षरता अभियान से जुड़ीं और महिलाओं को शिक्षा का महत्व समझाया। फिर स्वयं सहायता समूह बनाकर उन्हें आत्मनिर्भरता की राह दिखाई। कई सामाजिक संगठनों के साथ महिला-बाल अधिकारों पर अभियान चलाती हैं। शुरुआती दौर में वे साक्षरता अभियान से जुड़ी थी, लेकिन मोहल्ले की कुछ औरतों के साथ हुए अन्याय और उन्हें हक दिलाने के लिए उन्होंने इसे भी कार्यक्षेत्र बना लिया। घरेलू हिंसा के मामले अपने स्तर पर सुलझा कर परिवारों को जोड़ भी रही हैं। पोलम्मा बताती हैं कि मोहल्ले और आसपास के गांवों में जागरूकता अभियान के दौरान महिलाएं घरेलू हिंसा की बात उन तक पहुंचाती हैं।

मिलिए अपने हक के लिए लडऩा सिखाने वाली भिलाई की पोलम्मा से, इन्होंने आत्मनिर्भरता से बदली है कई महिलाओं की जिंदगी

तब समझ आई अधिकारों की बात
पोलम्मा ने बताया कि एक महिला को उसके पति की दुर्घटना में मौत के बाद ससुराल वालों ने बच्चों समेत घर से बाहर निकाल दिया। तब वे टीम के साथ वहां पहुंची और ससुराल वालों को बताया कि पति के घर में रहना पत्नी का अधिकार है। उसी दिन उन्होंने सही मायने में महिला अधिकारों की बात को समझा। तब से लेकर आज तक वे महिलाओं के हक के लिए संघर्ष करती आ रही है।

डिपे्रशन से निकली और बनीं मददगार
एक महिला पति की बीमारी के बाद मौत के सदमे से उबरी लेकिन कुछ अर्से बाद ट्यूमर ने दोनों बच्चों को छीन लिया। वह डिप्रेशन में आ गई। उसे जान देने से बचा लिया। अब वह कई महिलाओं को सिलाई का प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बना रही है।

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Dakshi Sahu Desk/Reporting
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