Patrika Positive News: जज्बे को सलाम, खुद थैलेसिमिया से पीड़ित पर कोविड मरीजों के लिए ब्लड और प्लाज्मा अरेंज करने में लगी स्नेहा और आस्था

Patrika Positive News: हुडको निवासी हेमंत नाइक की दोनों बेटियों में गजब का हौसला है। वे अपनी तकलीफों को भूलकर दूसरों को मदद करने निकल पड़ी है।

By: Dakshi Sahu

Updated: 14 May 2021, 07:12 PM IST

भिलाई. Patrika Positive News: हौसले किसी हकीम से कम नहीं होते, तकलीफ में भी दवा का काम करते हैं.. कुछ ऐसा ही हौसला भिलाई की दो बहनें स्नेहा और आस्था दिखा रही है। चार महीने की उम्र में थैलेसिमिया से पीडि़त नेहा को हर महीने दो बोतल खून चढ़ता है.. तो छोटी बहन आस्था को थैलेसिमिया सिम्टमेटिक है, लेकिन यह दोनों बहने इन दिनों कोरोना मरीजों के लिए ब्लड और प्लाज्मा डोनर को ढूंढने का काम कर रही है। हुडको निवासी हेमंत नाइक की दोनों बेटियों में गजब का हौसला है। वे अपनी तकलीफों को भूलकर दूसरों को मदद करने निकल पड़ी है। इसके लिए उन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया और पिछले 20 दिनों से लगातरा वे रायपुर, दुर्ग, भिलाई, खैरागढ़, राजनांदगांव जैसे शहरों में जरूरतमंदों के लिए प्लाजमा डोनेट करा रही हैं। इन 20 दिनों मं 13 लोगों को सहयता पहुंचा चुकी हैं।

कोविड जंग जीतने में मदद कर रहे
स्नेहा और आस्था का मानना है कि इस महामारी में हम सभी को एकदूसरे का सहारा बनकर चलना है। भले ही हम किसी को नहीं जानते, पर उनके दर्द और तकलीफ को महसूस कर सकते हैं। सोशल मीडिया पर उनका नंबर वायरल होने के बाद लोग उनसे जब संपर्क करते हैं, तो उनकी बेबसी देख मन द्रवित हो जाता है, तब लगता है कि अगर उनकी छोटी सी मदद से किसी की जान बच जाए तो उनके लिए इससे बढ़कर नेक कार्य दूसरा नहीं होगा। वही नेहा के पिता हेमंत नाइक भी लोगों की कोविड से जंग जीतने मदद कर रहे हैं।

जज्बा हो तो सब संभव
नेहा का मानना है कि लोगों की मदद के लिए केवल घर से बाहर निकलकर काम करना जरूरी नहीं। मन में कुछ करने का इरादा हो तो घर बैठे भी मदद पहुंचाई जा सकती है। दोनों बहनों ने बताया कि अप्रैल के शुरुआती दिनों में कोरोना की दूसरी लहर से लोगों की मौते हो रही थी। तब उनका मन भी काफी विचलित हुआ, मन में विचार आया कि ऐसा कुछ करें, जिससे लोगों को मदद मिल सके। तभी उनके एक सीनियर जो प्लाज्मा और ब्लड डोनेशन के लिए काम करते हैं, उनके संपर्क में आकर उन्होंने सोशल मीडिया पर हेल्पलाइन शुरू की। जिसके बाद मदद के लिए कई फोन आने लगे। वे बताती हैं कि जब प्लाज्मा और ब्लड के लिए फोन आता है, तब वे ब्लड बैंक और कई ब्लड डोनर से संपर्क करती हैं और उन्हें प्ल्जामा डोनेट करने प्रेरित करती हैं, ताकि वे दूसरों की जिंदगी बचा सकें।

समझाना जरा मुश्किल
स्नेहा और आस्था ने बताया कि कोविड से ठीक होने के बाद भी लोग प्लाज्मा डोनेट करने से डरते है, जबकि डॉक्टर्स खुद कोविड मरीजों को ठीक होने के बाद प्लाज्मा डोनेट करने की बात कहते हैं। वे बताती हैं कि सब कुछ जानने के बाद भी लोग मुश्किल से ब्लड डोनेट करने तैयार हो रहे हैं। जबकि उनकी टीम प्लाज्मा डोनर को घर से डोनेशन सेंटर तक आने और वापस घर तक पहुंचाने की सारी सुविधा दे रही हैं।

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