छत्तीसगढ़ के पारंपरिक हरेली त्योहार पर किसानों ने की कृषि औजारों की पूजा, गोवंश को खिलाया औषधि युक्त लोंदी

सोमवार को हरेली(हरियाली अमावस्या) तिहार पर किसानों ने कृषि औजारों की पूजा की। बैलों को भी औषधि खिलाई, ताकि वे सालभर तंदुरुस्त रहे। (Chhattisgarh traditional festival hareli)

By: Dakshi Sahu

Published: 20 Jul 2020, 12:31 PM IST

भिलाई. गुरहा चीला के साथ गुलगुला भजिया और ठेठरी-खुरमी का स्वाद ने हरेली के तिहार का मजा दोगुना कर दिया। सोमवार को हरेली(हरियाली अमावस्या) तिहार पर किसानों ने कृषि औजारों की पूजा की। बैलों को भी औषधि खिलाई, ताकि वे सालभर तंदुरुस्त रहे। मान्यता है कि हरेली तिहार से पहले कृषि कार्य पूरा हो जाता है। यानी बोआई, बियासी,रोपाई के बाद किसान और पशुधन दोनों ही आराम करते हैं। इस बार भी हरेली की सरकारी छुट्टी की वजह से कारण गांव-देहात के साथ शहर में भी हरेली का त्योहार का उत्साह देखने मिला। कोरोना की वजह से लोग इसे अपने-अपने घरों में ही मना रहे हैं। इस बार गांवों में गेड़ी दौड़ के साथ अन्य कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन नहीं किया जा रहा है।

औजारों की पूजा की
हरेली के दिन किसान अपने हल सहित कृषि औजार, रापा- गैंती, कुदाली, टंगिया, जैसे कई औजार जो कृषि कार्य में उपयोग होते हैं उनकी पूजा करेंगे। इस अवसर पर हल पर गुरहा चीला जो चावल के आटे में गुड़ डालकर तैयार किया जाएगा, उसका भोग लगाया जाएगा। साथ ही गुलगुला भजिया भी खास तौर पर बनाया जाएगा।

खिलाएंगे औषधि
हरेली के दिन बैल और गाय की सेहत की चिंता भी किसान करते हैं। आटे में दसमूल और बागगोंदली(एक तरह की जड़ीबूटी) को मिलाकर खिलाया गया, ताकि उन्हें कोई बीमारी ना हो। बारिश के दिनों में पशुओं को कई तरह की बीमारी हो जाती है, यह औषधि इन बीमारियों को होने से बचाती है। किसान लिलेश कुमार ने बताया कि हरेली त्योहार से किसानों और पशुधन के आराम के दिन शुरू होते हैं। पुराने जमाने में हरेली से पहले बोआई, बियासी का काम पूरा हो जाता था। फसल के पकने तक पशुओं को भी आराम मिलता था।

प्रतीकात्मक हुई औजारों की पूजा
हर बार की तरह इस बार भी हरेली पर किसानों और बैलों को आराम नहीं मिलेगा। जिले में अभी बोआई का काम कई जगह बाकी है। जुलाई का अभी पहला पखवाड़ा ही बीता है और जब तक खेतों में पानी नहीं भरेगा तब तक बियासी का काम नहीं हो पाएगा। हरेली के बाद भी किसानों को खेत में जाकर काम करना होगा। इसलिए सोमवार को वे केवल प्रतीकात्मक पूजा ही कर पाए, क्योंकि कृषि औजारों का उपयोग तो उन्हें अभी करना ही होगा।

चौखट पर लगाया नीम की टहनी
हरेली के दिन घर की चौखट पर कील ठोकने और नीम की टहनी लगाने की परंपरा भी है। गांवों में यह रस्म लोहार निभाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में कुछ अशुभ नहीं होता। हालांकि नीम की टहनी लगाने के पीछे वैज्ञानिक कारण यह भी माना जाता है कि नीम के होने से बारिश में पनपने वाले मÓछर और अन्य कीट दरवाजे के अंदर नहीं जाते।

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