scriptTribal painting and tattooing design reached on the fabric | मधुबनी पेंटिंग: जनजातीय चित्रकारी और गोदने की डिजाइन पहुंच गई फैब्रिक पर | Patrika News

मधुबनी पेंटिंग: जनजातीय चित्रकारी और गोदने की डिजाइन पहुंच गई फैब्रिक पर

गल्र्स कॉलेज दुर्ग में रजा फाउंडेशन के सहयोग से चल रहे आदि-रंग वर्कशॉप में दूसरे दिन मधुबनी पेंटिंग सीखने छात्राएं उमड़ पड़ी।

भिलाई

Updated: December 05, 2017 10:17:24 pm

भिलाई .खूबसूरत साडिय़ों और कैनवॉस पर बिना किसी प्लानिंग के बस श्रवण पासवान ने पेंटिंग ब्रश उठाया और कैनवास पर उकरने लगे कुछ अटपटे चित्र... हाथों में वरमाला लिए माता सीता और सामने खड़े भगवान श्रीराम.. चेहरे में बड़ी-बड़ी आंखों के साथ कचनी और भरनी के जरिए बारीक डिजाइन ने उसे और भी खूबसूरत बना दिया। गल्र्स कॉलेज दुर्ग में रजा फाउंडेशन के सहयोग से चल रहे आदि-रंग वर्कशॉप में दूसरे दिन मधुबनी पेंटिंग सीखने छात्राएं उमड़ पड़ी, जितना मजा उन्हें पेंटिंग सीखने में आ रहा था उससे कही ज्यादा वे मधुबनी पेंटिंग से जुड़ी लोककथा को सुनने में आ रहा था। इसी तरह अंबिकापुर से आई सुफियानो बाई ने भी शरीर पर बनाए जाने वाले गोदने की डिजाइन को कपड़े पर उकेर कर उसे अलग ही तरीके से पेश किया। जितनी बारीक और खास उनकी डिजाइन थी, उतने ही खास उनके रंग.. फूल,पत्ते और फल को पीस कर बनाए शोख रंग देखते ही बनते थे।
Madhubani painting
दीवार के 'कोहबर बने मधुबनी पेंटिंग
बिहार के मधुबनी जिले के चितारा गांव के श्रवण पासवान ने बताया कि मधुबनी पेंटिंग मूल रूप से मिथिलांचल में बनाए जाने वाले कोहबर से आई है। शादी के दौरान यह 'कोहबरÓ दीवार पर बनाया जाता था, लेकिन धीरे-धीरे इसे कैनवॉस और कपड़ों पर उकेरा जाने लगा। इस पेंटिंग में ज्यादातर श्रीराम और सीता के प्रसंगों को ही लिया जाता है। क्योंकि मिथिला में ही श्रीराम का विवाह हुआ था जिसके कारण उनके चित्रों को विशेष रूप से शामिल किया जाता है। उन्होंने बताया कि इन दिनों साडिय़ों, दुपट्टों, कुर्ती में मधुबनी पेंटिंग खासी पसंद की जा रही है। श्रवण ने बताया कि इस पेंटिंग में पेंसिल का उपयोग नहीं होता। यानी पहले से डिजाइन नहीं उकेरी जाती। बस कलर में ब्रश डूबोया और शुरू हो गए.. इसमें सबसे पहले बार्डर तैयार होती है और उसके बाद अंदर चित्र बनाए जाते हैं। जिसमें कचनी और भरनी के जरिए इसे और आकर्षक बनाया जाता है। उन्होंने बताया कि कचनी का मतलब आउटलाइन को दोबार करना और भरनी का अर्थ रंग भरना होता है।
अब हाथ पर नहीं कपड़े पर गोदना
कभी शरीर में गहनों की जगह गोदना नजर आता था, लेकिन अब गोदना शरीर की बजाए चित्रशैली का रूप ले चुका है। अंबिकापुर से आई सुफियानो बाई पावले आज 60 वर्ष की उम्र में भी काफी चुस्ती से गोदना चित्र बना लेती हैं। पांच वर्ष की उम्र में उसने गोदना चित्रशैली सीखी और पूरे गांव की महिलाओं को सिखाया। सुफियानों बाई की खासियत है कि वे फैब्रिक पर गोदना चित्रकारी के लिए आर्टिफिशियल कलर का उपयोग नहीं करती बल्कि अपने लिए खुद कलर तैयार करती हैं। जिसमें काला रंग तैयार करने हर्रा-बहेरा, तेंदू की छाल और फल, लाल या महरून रंग के लिए परसा के फूल, रोहिना की छाल, हरे रेंग के लिए खैर खिरवाती के पत्ते और फूलों का उपयोग किया जाता है। वे बताती हैं कि गोदना चिरसंगिनी की तरह है। जो मृत्यु तक साथ होता है। छत्तीसगढ़ में गोदना का अलग-अलग महत्व है। जिसमें मंगलसूत्र की जगह गले में गोदना, चूड़ी की जगह शखां चूड़ी, पायल की जगह भी गोदने का इस्तेमाल किया जाता है।
 

छात्राओं सहित महिलाएं भी हिस्सा ले रहीं
7 दिनों तक चलने वाली वर्कशॉप में छात्राओं को पिथौरा पेंटिंग, गोंड पेंटिंग, भील पेंटिंग, गोंड पेंटिंग, गुजराती कलमकारी भी सिखाई जा रही है। जिसमें कॉलेज की छात्राओं सहित चित्रकारी में रूचि रखने वाली महिलाएं भी हिस्सा ले रहीं हंै। प्राचार्य डॉ. सुशील चंद तिवारी ने बताया कि इस वर्कशॉप के माध्यम से खासकर फाइन आर्ट की छात्राओं को एक ही जगह चित्रकारी की कई विधा सीखने मिल रही है।
साथ लेकर आए सामान
यह सभी चित्रकार अपने साथ कैनवॉस और फेब्रिक्स भी साथ लेकर आएं हैं जिसमें उन्होंने साडिय़ां, कुर्ती, दुपट्टे, चादरों में अपनी कलाकारी उकेरी है। इन्हें सभी काफी पसंद भी कर रहे हैं।

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