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नहाय खाय के साथ 4 दिवसीय छठ पूजा शुरू

10 नवम्बर को अस्त होते सूर्य को दिया जाएगा अघ्र्य, 11 को होगा समापन

भीलवाड़ा

Updated: November 08, 2021 08:33:16 am

भीलवाड़ा।
सूर्य उपासना का 4 दिवसीय छठ पूजा पर्व सोमवार से प्रारंभ होगा। छठ पूजा का समापन 11 नवंबर को उगते सूर्य को अघ्र्य देने के साथ होगा। पूर्वांचल के लोग पर्व की तैयारियों में जुट गए हैं। इस अवसर पर घरों में रोशनी की जाएगी। शाम को छठ मैया के गीत गाए जाएंगे और महिलाएं उपवास रखेंगी।
यह होगा छठ पूजा में
संजय झा ने बताया कि 8 नवंबर सोमवार को नहाय खाय के साथ छठ पूजा पर्व की शुरुआत होगी। सुबह भगवान सूर्यदेव और उनके वाहन श्रुति की पूजा की जाएगी। शाम को छठ मैया को भोग लगाया जाएगा। प्रसाद ग्रहण करने के बाद 24 घंटे का व्रत प्रारंभ होगा। दूसरे दिन ९ नवम्बर मंगलवार को खरना होगा। इस दिन शाम को व्रती खरना का प्रसाद ग्रहण कर उपवास खोलेंगे। छठ मैया को खरना का भोग लगाने के बाद पहले व्रती प्रसाद ग्रहण करेंगे। इसके बाद परिवार के अन्य सदस्य खाना खाएंगे। इसके बाद एक बार फिर व्रतियों का 36 घंटे का उपवास प्रारंभ होगा। तीसरे दिन १० नवम्बर बुधवार को मान सरोवर झील, जलदाय विभाग के टैंक, धांधोलाई तालाब, चन्द्रशेखर आजाद नगर स्थित टैंक समेत अन्य जलाशयों पर अस्त होते सूर्य को अघ्र्य दिया जाएगा। महिलाएं पानी में खड़े होकर सूर्य की पूजा करने के बाद अघ्र्य देंगी। पूजा में विशेष रूप से बांस से बना सूप (छाजला) काम में लिया जाएगा। सूप में ठेकुआ, खजूर, केला, सीताफल, गन्ना, मीठा व नींबू रखकर पूजा की जाएगी है। छठ मैया के गीत गाए जाएंगे।
आखिरी दिन उगते सूर्य को अघ्र्य
छठ पूजा के चौथे और आखिरी दिन 11 नवंबर को सूर्य की प्रथम किरण को अघ्र्य दिया जाएगा। इस दिन अलसुबह महिलाएं तालाब व नदियों के घाट पर पहुंचकर स्नान करेंगी। सूर्य को अघ्र्य देने के बाद महिलाएं प्रसाद ग्रहण कर उपवास खोलेंगी। इसी के साथ छठ पूजा का समापन होगा।
खरना का प्रसाद- गन्ने के रस से बनाई जाती है खीर
छठ पूजा के दूसरे दिन पूर्वांचल के लोगों के घरों में विशेष रूप से खरना का प्रसाद बनाया जाता है। खरना गन्ने के रस से बनी चावल की खीर होती है। इसके अलावा चावल का पि_ा व बिना नमक की रोटी बनाई जाती है। दूसरे दिन मिठाई के रूप में ठेकुआ बनाया जाता है, जो गुड़ और आटे से बनता है। छठ पूजा के पहले दिन लौकी की सब्जी, दाल और अरवा (चावल) बनाते हैं। पूर्वांचल के लोग इसी भोजन से मेहमान नवाजी करते हैं।
सूर्य की पूजा से कर्ण बने थे महान योद्धा
एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। एक अन्य मान्यता के अनुसार सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की। प्रतिदिन कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्यदेव को अघ्र्य देते थे। सूर्यदेव की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे। कुछ कथाओं में द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है।
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