काले सोने का मेहनताना बढ़े तो फिर दिवाली ही दिवाली

कड़ी मेहनत और कडे़ कायदे कानून की काले सोने यानि अफीम की खेती। इसमें भी प्रकृति की मेहर नहीं हो तो मेहनत पर पानी फिरते देर नहीं लगती है। औसत एवं गाढ़ता केन्द्रीय नारकोटिक्स के तय मापदंड में देने में चूक हुई तो फिर उपज के लिए मिलने वाले दस आरी के पट्टे जाने में भी देर नहीं लगती है। इन सब के बीच चोरों एवं तस्करों से फसल को बचाने की कड़ी चुनौती भी किसानों पर रहती है। अफीम काश्तकारों की उपज के दौरान पग-पग पर अग्निपरीक्षा होती है।


नरेन्द्र वर्मा

भीलवाड़ा। कड़ी मेहनत और कडे़ कायदे कानून की काले सोने यानि अफीम की खेती। इसमें भी प्रकृति की मेहर नहीं हो तो मेहनत पर पानी फिरते देर नहीं लगती है। औसत एवं गाढ़ता केन्द्रीय नारकोटिक्स के तय मापदंड में देने में चूक हुई तो फिर उपज के लिए मिलने वाले दस आरी के पट्टे जाने में भी देर नहीं लगती है। इन सब के बीच चोरों एवं तस्करों से फसल को बचाने की कड़ी चुनौती भी किसानों पर रहती है। अफीम काश्तकारों की उपज के दौरान पग-पग पर अग्निपरीक्षा होती है।

विकट हालात की काले सोने की फसल को लेकर हाल ही नारकोटिक्स विभाग व पुलिस के कुछ अधिकारियों व कर्मियों के पट्टे जारी करवाने तथा डोडा चूरा को नष्ट कराने के नाम हुए भ्रष्टाचार के खेल ने मेहनतकश किसानों की मुसीबतें बढ़ा दी हैं। इसका सर्वाधिक खमियाजा भी अफीम किसानों को भुगतना पड़ रहा है। हालांकि भ्रष्ट सरकारी कारिंदों के खिलाफ कानून अपना काम कर रहा है, लेकिन इन सबके के बीच लम्बरदार की छवि भी प्रभावित हुई है। केन्द्र सरकार ने हाल ही नई अफीम नीति जारी की है। इससे कई किसानों को लाभ पहुंचा है, लेकिन किसान अफीम की खरीद मृल्य नहीं बढऩे से निराश हैं। किसानों को उपज के दाम उनकी उम्मीदों से काफी कम मिलते हैं। केन्द्र सरकार के मापदंड के आधार पर अभी किसानों को औसत एवं गाढ़ता के आधार पर प्रतिकिलो अफीम की खरीद की कीमत ८७० रुपए से लेकर ३५०० रुपए मिल रही है। इसके विपरीत इसी काले सोने की कीमत तस्करी में लिप्त लोगों के हाथों में लगने से एक लाख रुपए प्रतिकिलो तक मानी जाती है। अफीम के ही एक रूप हेरोइन की कीमत तो प्रतिकिलो एक करोड़ से अधिक आंकी जाती है।

पांच जिलो में काला सोना
प्रदेश में भीलवाड़ा, चित्तौडग़ढ़, प्रतापगढ़, कोटा व झालावाड़ जिले में बड़ी संख्या में किसान अफीम की खेती करते हैं। इमानदारी से खेती कर पट्टा बहाल रखने की कड़ी चुनौती रहती है। इसके साथ ही उनकी भी सरकार से कई उम्मीदें रहती हैं। इनमें अफीम की कीमतें बढ़ाने, लम्बरदारों, पट्टा वितरण एवं अफीम तोल से जुड़े अधिकारियों व कर्मचारियों के ईमानदार व निष्पक्ष होना मुख्यत: शामिल है। अफीम उपज क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों को भी चाहिए कि वे अफीम काश्तकारों की परेशानियों व समस्याओं को समझें व फसल की पर्याप्त कीमत दिलाने के लिए सरकार तक पैरवी करें।

Narendra Kumar Verma
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