शुद्ध पानी के नाम पर सवा करोड़ की धूलधाणी, गांव को नहीं पिला पाए आरो का पानी

जिले में जलदाय विभाग की लाचारी एक बार फिर सामने आई है। ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने की मुहिम पर अफसरों की लापरवाही भारी पड़ी है। आलम यह है कि अनदेखी के कारण सरकारी योजना में सवा करोड़ रुपए की धूलधाणी हो गई। नलकूप के फ्लोराइड, टीडीएस व नाइटे्रट युक्त पानी को फिल्टर करके पिलाने के लिए जिले के ३३ गांवों में लगाए आरो प्लांट में आधे खराब हो गए है।

By: Akash Mathur

Published: 08 Oct 2021, 11:42 PM IST

भीलवाड़ा. जिले में जलदाय विभाग की लाचारी एक बार फिर सामने आई है। ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने की मुहिम पर अफसरों की लापरवाही भारी पड़ी है। आलम यह है कि अनदेखी के कारण सरकारी योजना में सवा करोड़ रुपए की धूलधाणी हो गई। नलकूप के फ्लोराइड, टीडीएस व नाइटे्रट युक्त पानी को फिल्टर करके पिलाने के लिए जिले के ३३ गांवों में लगाए आरो प्लांट में आधे खराब हो गए है। एेसे में ना ग्रामीणों को आरो का पानी नसीब हुआ ना ही उनको भारी पानी से निजात मिली। हलाांकि अफसर चम्बल की दुहाई देकर लापरवाही से बचने का प्रयास कर रहे है। इससे विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हुए है।

जानकारी के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में नलकूप से सप्लाई हो रहे पानी में टीडीएस और फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने से पीने लायक नहीं होता। पेयजल की समुचित व्यवस्था नहीं होने से ग्रामीण उस पानी को पीने को मजबूर थे। एेसे में सरकार ने ग्रामीणों को आरो का पानी पिलाने की योजना को हाथ में लिया। जिले के ३३ गांवों में नलकूप पर आरओ प्लांट लगवाया गया। इनमें करीब दो साल से २० प्लांट बंद हो गए। इससे लोगों को फ्लोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर होना पड़ रहा। ३३ गांवों में लगाए गए प्लांट पर कुल २ करोड़ ८० लाख रुपए का खर्चा आया था।

भारी पानी से यह बीमारी का डर
फ्लोराइड युक्त पानी पीने से फ्लोरोसिस नामक रोग हो सकता है। हड्डिया कमजोर होने के साथ ही जोड़ो में हलचल नहीं रह पाती। नाइटे्रट युक्त पानी बच्चों को रोगी बना सकता है। टीडीएस वाला खारा पानी स्वास्थ्य के लिए हानिकारण है। एटीएम की तरह करता था काम, बीस पैसा प्रति लीटर गांवों में लगाया गया आरओ प्लांट एटीएम की तरह काम करता था। इसके लिए लगभग पचास हजार वाले ग्रामीण क्षेत्रों में प्लांट लगाया गया था। हर घर में कार्ड बांटे गए। उसी के अनरूप लोग मशीन में कार्ड डालकर आरो का पानी भर सकते थे। बीस पैसा प्रति लीटर कीमत रखी गई थी।

यह बना कारण, इसलिए धरातल नहीं पकड़ पाई रफ्तार
ठेकदार की ओर से लगाए गए आरओ प्लांट के बंद होने का कारण अनदेखी रहा। ठेकेदार की ओर से श्रमिकों को समय पर मजदूरी नहीं देने, बिजली का बिल नहीं भरने, वाटर कार्ड रिचार्ज नहीं करने जैसी समस्या थी। जबकि सात साल आरओ को चलाने की जिम्मेदारी ठेकेदार की ही थी।

Akash Mathur
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