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तिलस्वा कुंड में भोले के नाम की लगती है डूबकी

श्री तिलस्वां महादेव मन्दिर की प्रदेश एवं देश में अपनी विशिष्ट पहचान है। सावन मास व महाशिवरात्रि में तो यहां का प्राकृतिक सौंदर्य भी खिल उठता। यहां मंदिर के सम्मुख विशाल पवित्र कुण्ड है। पवित्र कुंड में भक्त भोले का नाम लेकर डूबकी लगाते है।

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In Tilswa Kund, the name of Bhole seems to be drowning

In Tilswa Kund, the name of Bhole seems to be drowning

भीलवाड़ा। श्री तिलस्वां महादेव मन्दिर की प्रदेश एवं देश में अपनी विशिष्ट पहचान है। सावन मास व महाशिवरात्रि में तो यहां का प्राकृतिक सौंदर्य भी खिल उठता। यहां मंदिर के सम्मुख विशाल पवित्र कुण्ड है। पवित्र कुंड में भक्त भोले का नाम लेकर डूबकी लगाते है। स्नान के बाद मिट्टी का लेप करते है। मान्यता है कि मिट्टी के लेप से चर्म रोग दूर होते है। यहां आने वाले श्रद्धालु यहां की जल से स्नान करना नहीं भूलता है। जिला मुख्यालय से 88 किलोमीटर दूर व नेशनल हाइवे 76 सलावटिया से नौ किलोमीटर पूर्व दिशा में अरावली की पर्वत श्रंखलाओं तथा सेंड स्टोन के पहाड़ों पर ऐरू नदी के किनारे तिलस्वां में भगवान शंकर का भव्य पौराणिक मंदिर है।


महंत गोपाल लाल पाराशर ने बताया कि यहां कुंड के बीच जाने के लिए सुंदर पुलिया का निर्माण करवाया गया है तथा उनके मध्य में एक और कुंड यानि बावड़ी है। इसके सम्मुख एक संगमरमर से गंगा माता मंदिर बना हुआ है। इस पर चलने वाले से फ ुव्वारों से यहां की छंटा अद्भुत होती हैं। पुलिया की सढियों के दोनों तरफ छतरिया है।

शिव परिवार छतरी में विराजमान है

शिव मंदिर का दुर्लभ शिव परिवार छतरी में विराजमान है। यहां अन्नपूर्णा का मंदिर, तोरण द्वार,शनि मंदिर, विष्णु भगवान का मंदिर, गणेश मंदिर, महाकाल मंदिर, सूर्य मंदिर है। यहां मंदिर में भगवान शंकर की एक ***** के रूप में पूजा होती हैं यहां स्थापित शिव व पार्वती की मूर्तियां आदि काल से स्थापित है। तिलस्वा महादेव में मंगला आरती दर्शन सुबह चार बजे, राज आरती दर्शन सुबह नौ बजे, राज भोग सुबह ग्यारह बजे व संध्या आरती दर्शन सूर्यास्त पर होती है।

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