मोक्ष प्राप्ति के लिए तीर्थंकर बनना आवश्यक नहीं-मुनि विद्यासागर

तीर्थंकर नाम कर्म का बंध सौलह कारण भावना

By: Suresh Jain

Updated: 07 Sep 2021, 08:39 PM IST

भीलवाड़ा।
मोक्ष प्राप्ति के लिए तीर्थंकर बनना आवश्यक नहीं है। भरत, बाहुबली, भगवान राम आदि अनेकानेक प्राणियों ने बिना तीर्थंकर बने भगवान पद प्राप्त किया। तीर्थंकर के अभाव में धर्म तीर्थ का प्रवर्तन नही हो सकता है। प्राणी मात्र के कल्याण के लिए मोक्ष मार्ग का दिग्दर्शन तीर्थंकर के उपदेश से ही होता है। तीर्थंकर पद बंध पुण्योदय की सबसे उत्कृष्ट स्थिति है, जो भरत, ऐरावत, विदेह आदि क्षेत्रों के कर्म भूमि के जीवों को केवली, श्रुतकेवली के पाद मूल में सौलह कारण भावना भाने से होता है। यह बंध चौथे गुणस्थान से आठवें गुणस्थान तक श्रावक से लेकर मुनि जन को हो सकता है। तीर्थंकर नाम कर्म का बंध करने वाले प्राणी में सौलह से सौलह भावना हो यह आवश्यक नही है लेकिन पहली दर्शन विशुद्धि भावना होना आवश्यक है। यह बात बालयति निर्यापक श्रमण मुनि विद्यासागर महाराज ने मंगलवार को सुधासागर निलय में सौलह कारण भावना पर प्रवचन के दौरान कही।
महाराज ने कहा कि 25 दोषों से रहित, निंशकित, निकांक्षित आदि आठ गुणों से युक्त तत्व का यथार्थ श्रद्धान सम्यक दर्शन कहलाता है। सम्यक दृष्टि को मोक्ष मार्ग का कर्णधार कहा है। हर सम्यक दृष्टि जीव को दर्शन विशुद्धि भावना हो यह आवश्यक नही है। सम्यक दृष्टि तत्व के यथार्थ श्रद्धान के साथ पंचेन्द्रिय विषय का चिंतन या सेवन कर सकता है। लेकिन दर्शन विशुद्धि वाला जीव मात्र तत्व का चिंतन करता है, पंचेन्द्रिय विषय का नही। ऐसा जीव तत्व चिंतन के साथ निरंतर प्राणी मात्र के कल्याण के लिए यह भावना करता है कि सुखी रहे सब जीव जगत के कोई कभी ना घबरावे। उसका हृदय हमेशा दया के जल से भीगा रहता है।
रोठ तीज कल
ट्रस्ट अध्यक्ष नरेश गोधा ने बताया कि मंगलवार को भगवान की मूर्तियों को उज्जवल करने एवं वेदी में सफाई के साथ बडी प्रक्षालन की गई। गुरुवार को दिगम्बर जैन समाज रोठ तीज का पर्व मनाएगा। इस त्यौहार को त्रैलोक्य तीज भी कहते है। इस दिन भूत, भविष्य एवं वर्तमान के 24-24 तीर्थंकरों की पूजा की जाती है। इस दिन जैन परिवारों में रोठ एवं खीर बनाई जाती है। शुक्रवार से दिगम्बर समाज के दशलक्षण पर्व प्रारंभ होंगे।

Suresh Jain Reporting
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