उम्र के साथ जीवनशैली में बदलाव जरूरी -आचार्य महाश्रमण

जैनागम आधारित प्रवचन माला

By: Suresh Jain

Published: 13 Oct 2021, 09:07 AM IST

भीलवाड़ा।
चातुर्मास के बाद अपने क्षेत्र में आचार्य महाश्रमण के प्रवास की अर्ज लेकर भी विभिन्न क्षेत्रों से श्रावक समाज संघ आचार्य के दर्शनार्थ तेरापंथ नगर पहुंच रहे है। नवरात्र के संदर्भ में प्रतिदिन आध्यात्मिक अनुष्ठान का क्रम भी निरन्तर जारी है।
जैनागम आधारित प्रवचन माला में आचार्य महाश्रमण ने कहा कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सौ वर्ष की आयु को पूर्ण आयुष्य कहा जा सकता है। शतायु पुरुष के जीवन की दस अवस्थाएं होती है। प्रत्येक अवस्था का काल दस वर्ष होता है। हर दशक में व्यक्ति में उम्र के अनुसार परिवर्तन देखने को मिलता है। जैसे बाल बचपन की अवस्था। क्रीड़ा खेलने कूदने की उम्र। मंद-जिसमे बुद्धि बल प्रदर्शन थोड़ा मंद हो जाता है। बला इस अवस्था में बल प्रदर्शन की क्षमता बढ़ जाती है। प्रज्ञा पारिवारिक चिंतन इस अवस्था में हावी होता है। हाईनी इंद्रिय का ह्रास। प्रपंचा। प्राधारा जिसमे बुढ़ापा आजाता है। मनमुखी इस अवस्था में बुढ़ापा आक्रमण कर लेता है। क्षायिनी इस अवस्था में व्यक्ति शारीरिक बल से इतना दुर्बल हो जाता है कि वह अक्सर सोया रहता है। तनाव दुख, मूच्र्छा में रहता है। उपरोक्त जीवन की हर अवस्था एक-एक दशक की होती है। एक से सौ वर्ष की दस अवस्थाओं से बोध लेकर व्यक्ति को अपनी जीवन शैली में हर दस वर्ष के बाद मोड़ लेते हुए उम्र अनुसार अपने जीवन में परिवर्तन लाना चाहिए।
आचार्य ने कहा कि गृहस्थ हो या संयमी सभी को अवस्थानुसार ढलना चाहिए। बाल, क्रीड़ा अवस्था हो तो खेलने मे समय लगाते हुए आध्यात्मिक विकास करना चाहिए। यौवन अवस्था में शरीर की शक्ति का सैनिक की तरह सक्रिय उपयोग हो। संयम की साधना पुष्ट बने, वैराग्य वृद्धि होती रहे। इसके साथ ही स्वाध्याय, सेवा, व्याख्यान, भाषण, राग-रागिनी आदि कलाओं का विकास होता रहे। युवा हर क्षेत्र में कार्य कर सकता है। जीवन के आठवें, नवमें दशक में जब वृद्धावस्था होती है तब बैठे-बैठे साहित्य पठन, आध्यात्मिक धर्माराधना, त्याग, जप का क्रम चलना चाहिए। जीवन की ये अवस्थाएं प्रेरणा देती है कि किस अवस्था में कितना विकास हो। हर अवस्था का सम्यक उपयोग होना चाहिए।

Suresh Jain Reporting
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