पहाड़ों पर विराजी माता, भक्त फिर भी नहीं दूर

भीलवाड़ा जिले में शरदीय नवरात्र महापर्व में शक्तिपीठों व मंदिरों में माता के भक्तों की भारी भीड़ बनी हुई है। कोरोना संकट से जिले के उभरने से शक्तिपीठों पर प्रदेश के साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु आ रहे है।

By: Narendra Kumar Verma

Updated: 14 Oct 2021, 12:42 PM IST

भीलवाड़ा । जिले में शरदीय नवरात्र महापर्व में शक्तिपीठों व मंदिरों में माता के भक्तों की भारी भीड़ बनी हुई है। कोरोना संकट से जिले के उभरने से शक्तिपीठों पर प्रदेश के साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु आ रहे है। मंदिरों में रघुपति राघव राजाराम का जाप हो रहा है वहीं रात्रि जागरण में माता के भजन व गीत गूंज रहे है।

अरावली में विराजे चामुंडा बैराट माता
आसींद के बदनोर उपखंड क्षेत्र मुख्यालय से एक किलोमीटर दूर समुंदर तल से 2145 फ ीट ऊंचे अरावली पर्वत माला के बैराट शिखर पर चामुंडा देवी बैराट माता का मंदिर है। पर्वतमाला पर बैराट गढ़ भी है। जो कि 5 वर्ग मील में फैला है। प्राचीन में इंकदवत नगर यही स्थित था। मंदिर के पीछे 12 जलाशय तथा राजा भरतरी की गुफ ा है। यह मंदिर स्थल रमणीक दृष्टि से पर्यटन स्थल भी है। जानकार बताते है कि कि महाराणा कुंभा के समय देवी माता की प्रतिमा की स्थापना की गई है। यहां पंडित मदनलाल पाराशर का परिवार पूजा अर्चना करता है।

बीजासण माता का चमत्कारिक शक्तिपीठ
हनुमाननगर क्षेत्र के ग्राम पंचायत कूंचलवाड़ा कला में मां बीजासण महारानी बिराजित है। मान्यता है कि बीजासण माताजी का मंदिर चमत्कारिक शक्तिपीठ है और यहां लकवा बीमारी से पीडि़त रोगियों का ईलाज होता है। जानकार बताते है कि सामन्त काल से भी प्राचीन बस्ती के खेत में माता की मूर्ति स्व उद्भूत हुई तब से लेकर अब तक यह शक्ति समस्त मानव मात्र के आस्था का केन्द्र बनी हुई है। लगभग 120 वर्ष पूर्व गांव की कुम्हार जाति के परिवार को दैनिक पूजा अर्चना का दायित्व सौंपा गया जो आज भी अनवरत मां की सेवा में लीन है। यहां शतचण्डी महायज्ञ हो चुका है। वर्तमान में यहां जैसलमेर के पत्थरों से माता रानी के भव्य मंदिर का निर्माण किया जा रहा है।

बरवाड़ा से चौथ माता की जोत लाई
रायला कस्बा क्षेत्र में चौथ माता का प्राचीन कालीन मंदिर है। यहां पूर्व में चामुंडा माता की पुरानी मूर्ति स्थापित थी, बाद में चौथ का बरवाड़ा से चौथ माता की जोत ओर मूर्ति लाई गई, उसके बाद प्राण प्रतिष्ठा की गई है । आसपास के ग्रामीण व देश विदेश से भक्तजन यहां आते है। नवरात्रि व हर रविवार को यहां भीड़ रहती है। कोरोना की वजह से यहां दो साल से मेला नहीं भर रहा है। चौथ माता आचंलिया परिवार की कुलदेवी है।

सिद्धिदायिनी है यक्षणी माता
मांडल कस्बे के मध्य लगभग 350 फीट की ऊंची पहाडिय़ों पर यक्षणी माता का मंदिर है । जगदम्बा यक्षणी माता व अन्य देवियों का यह स्थान 9 वीं शताब्दी का है । जो प्राचीन काल से तांत्रिकों के लिए तपस्या की तपोभूमि मानी जाती है । यहां गत 60 वर्षों से शतचंडी पाठ व 110 वर्षो से प्रत्येक रविवार को रात्रि जागरण व भजन संध्या का आयोजन किया जा रहा है । मन्दिर के पीछे पहाड़ी पर मीनार है। मीनार पर सिद्धेश्वर महादेव का मंदिर स्थापित है । क्षेत्र के निवासी मीनार को मांडल का मीनारा के नाम से पुकारते है । इस मीनार की रोशनी के लिए के लिए हर मंजिल पर खिड़कियां व गोल सुराख बनाए गए । जिससे हवा व रोशनी मिलती है । हर मंजिल 15 फीट की है । प्रत्येक रविवार को रात्रि जागरण होता है। पाठ व हवन भी होता है । यहाँ पर दर्शन करने अन्य राज्यो से अनुयायी भी आते है ।

पहाड़ी पर अन्नपूर्णा माता शक्तिपीठ
जिला मुख्यालय से 22 किलोमीटर दूर गेंदलिया में पहाड़ी पर अन्नपूर्णा माता शक्ति पीठ है। जानकारों के अनुसार महाराणा प्रताप जब जंगलों की ओर निकले थे तब इस पहाड़ी पर कहीं माह रूके थे, नवरात्रि का समय होने से नवरात्र पर महाराणा ने अन्नपूर्णा माता व कालिका माता की मूर्ति की स्थापना कर नवरात्रा में उपासना की थी अन्नपूर्णा माता के सामने भैरू नाथ व उत्तर दिशा में गणेश महाराज हनुमान का मंदिर है, दक्षिण में भगवान शंकर विराजित है। शिखर मंदिर पर पहुंचने के लिए 251 सीढिय़ां चढऩे पड़ती है। भामाशाह नंदलाल जैथलिया ने यहां 251 सीटों का निर्माण करवाया गया है।

Narendra Kumar Verma Reporting
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