पैंथरों ने चट्टानों को बना रखा है ठिकाना

Panthers have built rocks in bhilwara जिले के वन क्षेत्र में पैंथर की दहाड़ की गूंज लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन वन्य जीव गणना के दौरान पैंथर की जिले में बड़ी संख्या में मौजूदगी के पुख्ता सबूत नहीं मिल पा रहे है। मांडलगढ़, लाडपुरा, करेड़ा क्षेत्र में खदानें सूनी होने एवं पानी भरा होने से यहां चट्टानों में कई पैंथर है

By: Narendra Kumar Verma

Updated: 27 Jun 2021, 12:52 PM IST

भीलवाड़ा। जिले के वन क्षेत्र में पैंथर की दहाड़ की गूंज लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन वन्य जीव गणना के दौरान पैंथर की जिले में बड़ी संख्या में मौजूदगी के पुख्ता सबूत नहीं मिल पा रहे है। ऐसे में मांडलगढ़, लाडपुरा, करेड़ा, बदनोर व दौलतगढ़ वन क्षेत्र में पैंथर होने के बावजूद यहां के एक दर्जन से अधिक गांव पैंथर के खतरे को भांप नहीं पा रहे है। यहां पैंथरों के हमलों से मवेशियों की जानें जरूर सांसत में है।

जिले में कोरोना संकट काल मार्च 2020 से गहराया हुआ है। पन्द्रह माह में जिले को दो बार लॉक डाउन को सहन करना पड़ा है। इससे श्रमिकों का पलायन होने एवं खेत खलिहान सूने होने से वन्य जीवों की आवाजाही आबादी क्षेत्र में बढ़ी है। खनन क्षेत्र में पैंथरों व हिसंक वन्य जीवों ने डेरे जमा रखे है।

मवेशियों पर हो रहा हमला

वन क्षेत्रों में मौजूदा हालात यह है कि पैंथर वन क्षेत्र के बजाए आबादी क्षेत्र के सूने खनन व परम्परागत जलस्रोतों में शरण लिए हुए है। भोजन पानी की तलाश में वह आबादी क्षेत्र तक में घुस जाते है, इनके अधिकांश शिकार खेतों में बंधे मवेशी हो रहे है। कुछेक स्थानों पर ग्रामीण भी हमले से जख्मी हुए है।

कागजों में घट रही संख्या

आबादी में आने से वन्य जीण गणना के दौरान वन विभाग के आंकड़ों में पैंथरों की संख्या बढऩे के बजाए घटती जा रही है। हालांकि वर्ष 2020 की गणना में वन क्षेत्र में 10 पैंथर होने की पृष्टि हुई, लेकिन इसी साल विभिन्न हादसों में पांच पैंथर की मौत हो गई। जिले में एक दशक में बाघ की मौजूदगी के कोई साक्ष्य नहीं मिले है, जबकि पैंथर यानि बघेरा भी वर्ष 2015 से लेकर 2019 की वन्य जीव गणना में सिर्फ तीन ही मिल सके। Panthers have built rocks in bhilwara

दो साल में 11 पैंथर की मौत

जिले में गत दो साल के दौरान बीमारी, ट्रेन व वाहनों की की चपेट में आने से 11 पैंथर की मौत हो चुकी है। रायपुर, दौलतगढ़, बदनोर, करेड़ा, मांडलगढ़ व लाडपुरा क्षेत्र में पैंथर के दहाड़े सुनाई देने से क्षेत्र के लोग अभी तक दहशत में है।


इनका कहना है........

पैंथर संरक्षण में बढ़ेंगे कदम

जिले आसीन्द, मांडलगढ़, गंगापुर व भीलवाड़ा रेंज में पैंथर की मौजूदगी बढ़ी संख्या में है। यह आंकड़ा करीब 80 का हो सकता है। मांडलगढ़, लाडपुरा, करेड़ा क्षेत्र में खदानें सूनी होने एवं पानी भरा होने से यहां चट्टानों में कई पैंथर है। यहां इनका कुनबा भी बढ़ रहा है। कई मादा पैंथर तो शावकों के साथ घूमती नजर भी आती है। गुरलां व पुर में भी हाल ही में पैंथर दिखे है। दो पैंथर इसी माह बिजौलिया के वन क्षेत्र में छोड़े है। वन्य जीव गणना के दौरान पैंथरों के अपने ठिकानों से बाहर नहीं आने से उनकी मौजूदगी के पुख्ता साक्ष्य नहीं मिल पाते है। जिले में पैंथर संरक्षण के लिए कार्य योजना पर भी काम हो रहा है। प्रदेश का चौथा टाइगर रिजर्व क्षेत्र घोषित होने एवं उसमें भीलवाड़ा वन क्षेत्र का दो सौ किलोमीटर का दायरा आने से भी पैंथर संरक्षण में मदद मिलेगी।

डीपी जागावत, उपवन संरक्षक, भीलवाड़ा

Narendra Kumar Verma Reporting
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