सीमा पर दुश्मनों से जीते, अपनों से हारे

सीमा पर दुश्मनों से जीते, अपनों से हारे
सीमा पर देशवासियों की रक्षा के लिए लोहा लेने वाले पूर्व सैनिक दुश्मनों से तो जीते लेकिन अपनों से हार गए। भूतपूर्व सैनिक अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के लिए सरकारी दफ्तरों में गुहार लगाते हैं लेकिन कहीं जमीन आवंटन के लिए चक्कर कटवाएं जाते हैं तो कहीं अन्य सुविधाओं के लिए।

Tej Narayan Sharma | Publish: Jan, 26 2018 09:34:57 PM (IST) Bhilwara, Rajasthan, India

सीमा पर देशवासियों की रक्षा के लिए लोहा लेने वाले पूर्व सैनिक दुश्मनों से तो जीते लेकिन अपनों से हार गए

भीलवाड़ा।

सीमा पर देशवासियों की रक्षा के लिए लोहा लेने वाले पूर्व सैनिक दुश्मनों से तो जीते लेकिन अपनों से हार गए। भूतपूर्व सैनिक अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के लिए सरकारी दफ्तरों में गुहार लगाते हैं लेकिन कहीं जमीन आवंटन के लिए चक्कर कटवाएं जाते हैं तो कहीं अन्य सुविधाओं के लिए। जिले में अभी करीब 2400 भूतपूर्व सैनिक है। साथ ही करीब 800 भूतपूर्व सैनिकों की पत्नियां है। इन परिवारों ने देश के लिए भले योगदान दिया हो लेकिन अब उन्हें खुद को संघर्ष करना पड़ रहा है। अकेले जहाजपुर क्षेत्र में 1600 भूतपूर्व सैनिक है। यहां पूर्व सैनिकों को मेडिकल, पेंशन जैसी सुविधाओं के लिए घूमना पड़ता है। यहां विश्रांति गृह भी नहीं बना है। हालांकि कुछ समय पहले सांसद सुभाष बहेडि़या ने अपने कोटे से विश्रांति गृह बनाने का कहा था। इसके अलावा पूर्व सैनिकों के लिए जिला मुख्यालय भी ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं है। यहां पर इतने फौजी होने के बावजूद कोई एकेडमी या मेडिकल सुविधा उपलब्ध नहीं है।

 

नहीं आ रही मोबाइल कैंटीन, कैसे खरीदे सामग्री

सरकार ने भूतपूर्व सैनिकों के लिए कैंटीन की सुविधा लागू कर रखी है। इसमें रियायती दर पर पूर्व सैनिकों को सामग्री प्रदान की जाती है। अब जिले में न तो स्थाई कैंटीन है और न ही मोबाइल कैंटीन आ रही है। एेसे में पूर्व सैनिकों के जो कार्ड बने हुए हैं वे भी बेकार हो गए है। स्थिति यह है कि यह सुविधा सभी जगह उपलब्ध है।

 

डिफेंस कॉलोनी की मांग नहीं हुई पूरी

पूर्व सैनिकों ने नगर विकास न्यास ने डिफेंस कॉलोनी की मांग भी रखी थी लेकिन इस पर विचार नहीं किया गया। पूर्व सैनिकों ने बताया कि कई बरसों पहले बापूनगर में कुछ भूखंड दिए गए थे लेकिन अब फौजी भी बढ़ गए। एेसे में शहर में कोई डिफेंस कॉलोनी होनी चाहिए ताकि उनके बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था यहां हो सके।

 

अस्पताल की जमीन मिली, अब भवन का इंतजार

भूतपूर्व सैनिकों के परिवारों को मेडिकल सुविधा प्रदान करने के लिए शहर में पॉलिक्लिनिक अस्पताल बनना है। नगर विकास न्यास ने इसके लिए भूमि आवंटन कर दिया है। अब इस पर अस्पताल बनेगा। पूरी व्यवस्था नहीं होने से सैनिक परिवारों को उपचार के लिए बाहर जाना पड़ता है।

 

वादे भूल गए

नवंबर 2017 में सैनिक कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष प्रेमसिंह बाजौर के नेतृत्व में शहीद सम्मान यात्रा निकाली गई थी। इसमें वे लोग वीरांगनाओं के घर मिलने गए। उसमें वादा किया था कि शहीदों के प्रति सम्मान बढ़ाने के लिए गांव के चौराहों पर शहीदों की प्रतिमाएं लगेगी। मुख्य चौराहों पर उनके संघर्ष का इतिहास लिखा जाएगा लेकिन एेसा कुछ भी नहीं हुआ है।

 

सैनिक कल्याण कार्यालय का खुद का भवन बन गया है। मोबाइल कैंटीन कुछ समय से नहीं आ रही है, इसका भी समाधान करेंगे। स्थानीय ऑफिस स्तर से कोई काम लंबित नहीं है। सभी को समय पर पेंशन मिल रही है। हम समय-समय पर जनसुनवाई भी करते हैं।
कर्नल उदयसिंह, जिला सैनिक कल्याण अधिकारी

 

पूर्व सैनिक सीमा पर तो जीत गए लेकिन अपनों से हार रहे हैं। कारण है कि छोटे-छोटे काम के लिए सरकारी दफ्तरों में चक्कर काटने पड़ते हैं।मोबाइल कैंटीन नहीं आने से सामग्री नहीं मिल रही है।
नरपतसिंह राठौड़, प्रवक्ता पूर्व सैनिक सेवा परिषद

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