कोरोना संक्रमण के कारण सवा साल से स्कूल बन्द, बच्चें होने लगे चिड़चिड़े

ऑनलाइन क्लॉस के दौरान अन्य से करते है चेटिंग, नहीं मानते है माता-पिता की बात

By: Suresh Jain

Published: 09 Jun 2021, 07:29 PM IST

भीलवाड़ा।
कोरोना संक्रमण के चलते पिछले सवा साल से स्कूल बन्द है। इस साल १०वीं व १२वीं के छात्रों को प्रमोट करना पड़ा है। लम्बे समय से घर में ही रहने के कारण बच्चे चिड़चिड़े होने लगे है। वे परिजनों की बात भी नहीं सुनते है। ये हालात किसी एक घर में बल्कि हर घर में देखने को मिल रहा है। यूं तो बच्चे अक्सर लम्बी छुट्टियों का इंतजार करते है, लेकिन पिछले साल से घर से बाहर नहीं निकलने से निराश बच्चों की उम्मीदों पर दूसरी लहर ने पानी फेर दिया है। सवा साल से घरों में कैद बच्चे मोबाइल एवं टीवी से ही चिपके रहते है। खेलकूद बंद होने उनकी दिनचर्या भी प्रभावित हुई है।
मनोचिकित्सकों के अनुसार स्कूल नहीं जाने का असर ज्यादातर 5 से 1५ साल के बच्चों पर देखने को मिला है। खेलकूद बंद होने से बच्चों की दिनचर्या बदली है। स्कूल न जाने से भी बच्चों पर असर आ रहा है। हालांकि सरकार ने पहली लहर का दौर कम होने के बाद 8 वीं तक के बच्चों के स्कूल खोल दिए थे, लेकिन दूसरी लहर शुरू होने के बाद स्कूलों को वापिस बंद करना पड़ गया। बिना परीक्षा दिए ही अगली कक्षाओं में प्रमोट हो रहे बच्चों को अब पढ़ाई की चिंता भी नहीं सता रही है।
ऑनलाइन के नाम पर देखते है फीचर
ऑनलाइन पढ़ाई से बच्चों में मनोवैज्ञानिक बदलाव हो रहा है। उनका एकाकीपन बढ़ रहा है। बच्चे मोबाइल से चिपके रहते हैं। उनका स्वभाव और प्रवृत्ति बदल रही है। कई बार तो बच्चे आनलाइन पढ़ाई के नाम पर अन्य लोगों से चेटिंग करते है। शिक्षाविदों का मानना है कि बच्चे मोबाइल पर तरह-तरह के फीचर फिल्म देखने या गेम खेलने में लगे रहते हैं। मोबाइल के लिए टोकने पर बच्चें आक्रामक हो जाते हैं।
भूलने लगे है बच्चें
कोरोना काल ने अपने नन्हें हाथों में रूल पेंसिल पकड़ कर स्वर व्यंजन, एबीसीडी एवं गिनती लिखना सीखने वाले छोटे बच्चों की आदत बिगाड़ दी है। स्कूल बंद होने से बच्चे सब कुछ भूल चुके हैं। यदि परिजन बच्चों को डरा-धमकाकर पढऩे भी बिठाएं तो वे स्कूल जाने का दबाव नहीं होने से बहानेबाजी कर पढ़ाई छोड़ अन्य शैतानियों में लग जाते हैं। शालिनी शर्मा का कहना है कि स्कूल में जाने के बाद बच्चे घर आकर एक से दो घंटे होमवर्क एवं पढ़ाई करते थे। लेकिन अब दिनभर टीवी, मोबाइल में गुजर जाता है।
बच्चों के साथ खुद भी पढ़े व खेले
बच्चों में मानसिक एवं शारीरिक बदलाव आना स्वभाविक है। ऐसे मामले सामने आ रहे है। पाबंदी होने से घर में कैद बच्चों के साथ अभिभावक समय बिताकर उन्हें खेलों के लिए प्रेरित करें। बच्चों के साथ खुद भी पढ़े एवं खेलें ताकि बच्चों का ध्यान अन्य चीजों के बजाय पढऩे एवं खेलने की ओर अग्रसर हो सके। अभिभावक स्वयं तनाव मुक्त रहकर बच्चों के सामने सकारात्मक बातें करें।
डॉ. वीरभान चंचलानी, सहायक आचार्य मनोरोग विशेषज्ञ

Suresh Jain Reporting
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