scriptThe flame of non-violence burned within man - Acharya Mahashraman | आदमी के भीतर जले अहिंसा की ज्योति-आचार्य महाश्रमण | Patrika News

आदमी के भीतर जले अहिंसा की ज्योति-आचार्य महाश्रमण

आचार्य ने दी अहिंसा का दीपक जलाने की प्रेरणा

भीलवाड़ा

Published: November 02, 2021 09:15:25 am

भीलवाड़ा।
रोशनी का महापर्व दीपावली 4 नवम्बर को है। असत्य पर सत्य की जीत के उपरान्त जब भगवान श्रीराम अयोध्या पहुंचे थे तो उस खुशी में अयोध्या में दीपोत्सव मनाया गया था। ऐसी पौराणिक कथाओं से भावित इस प्रकाशपर्व को भारत ही नहीं, पूरा विश्व ही बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाता है। आचार्य महाश्रमण ने दीपावली से पूर्व श्रद्धालुओं को बाह्य दीपक के साथ ही जन-जन के हृदय में अहिंसा की ज्योति जलाने की पावन प्रेरणा प्रदान की।
महाश्रमण सभागार में सोमवार को प्रवचन में आचार्य महाश्रमण ने अहिंसा के विषय में दो बातें बताई। कोई भी प्राणी दु:ख नहीं चाहता, इसलिए कोई भी प्राणी मारने के लिए नहीं है। भगवान महावीर ने एक बार साधुओं से पूछा आदमी किस चीज से डरता है, प्राणी दु:ख से डरता है। कोई भी प्राणी दु:ख से बचने का प्रयास करता है। जैसे कहीं मुझे चोट न लग जाए, मुझे किसी तरह का रोग न लगे, मुझे कोई मारे नहीं, मेरा सामान चोरी न हो आदि-आदि। अर्थात वह सदैव दु:ख से डरता है। आदमी स्वयं के प्रमाद के दु:ख पैदा करता है। अप्रमाद में रहने का प्रयास किया जाए तो दु:ख से बचा जा सकता है। जब प्राणियों को दु:ख अप्रिय है तो किसी भी प्राणी को दु:ख देने से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। अहिंसा के पथ पर चलने को ही ज्ञान का सार भी कहा गया है। आदमी यह सोचे कि यदि मुझे कोई कष्ट अप्रिय है तो वह कष्ट मैं किसी दूसरे को क्यों दूं। जिस प्रकार मुझे दु:ख अप्रिय है तो दूसरे के लिए भी तो दु:ख अप्रिय ही है। इसलिए आदमी को हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्य ने कहा कि अहिंसा ही परम धर्म है। आदमी के आत्मा के भीतर ही हिंसा और अहिंसा है। यदि कोई अप्रमत्त है, उसका भाव अहिंसा की चेतना से भवित है तो वह अहिंसक और जो प्रमत्त है, जिसके भावों में हिंसा भरी हुई तो वह हिंसक है। आदमी को अपने जीवन में जितना हो सके हिंसा का त्याग कर अहिंसा की साधना करने का प्रयास करना चाहिए। दीपावली पर्व को तेले, बेले और उपवास के माध्यम से भी मनाया जा सकता है। सबसे अच्छा है कि आदमी के भीतर अहिंसा का दीपक जले और हिंसा का अंधकार दूर हो। आदमी को अपने भीतर अहिंसा की ज्योति जलाने की प्रयास करना चाहिए। हिंसा से विरत रह कर भीतर में अहिंसा की ज्योति जलाएं तो यह प्रकाश का त्योहार सार्थक हो सकता है।
आदमी के भीतर जले अहिंसा की ज्योति-आचार्य महाश्रमण
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