भीलवाड़ा पुलिस को एेसा भी क्या हुआ कि अनुसंधान ही पड़ रहा भारी

यह तो बानगी भर है। भीलवाड़ा पुलिस अपने ही अनुसंधान में खुद उलझ रही। पुलिसकर्मियों को मुकदमे तक झेलने पड़ रहे। कहीं लापरवाही मानी जा रही तो कहीं दूषित अनुसंधान से आरोपी को बचाव का मौका दिया। पुलिस अधिकारियों को अदालत की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। डेढ़ साल में तेरह पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो चुका है।

By: Akash Mathur

Published: 27 Nov 2019, 02:30 AM IST

केस-१
किशोरी ने गुलाबपुरा थाने में मामला दर्ज कराया। बताया कि दो वर्ष पहले घर पर अकेली थी तो एक युवक आया व अश्लील हरकत की। विरोध पर डराया-धमकाया। जबरन सेल्फी ले सोशल मीडिया पर डाल दी। जांच तत्कालीन थाना प्रभारी भूराराम खिलेरी व सत्येन्द्र नेगी ने की। आरोपी को गिरफ्तार किया। बयानों में निरीक्षकों ने माना कि पीडि़ता या गवाह से फोटोग्राफ्स नहीं लिए जबकि ये अहम साक्ष्य थे। अदालत ने दोनों अधिकारियों पर कार्रवाई के लिए डीजीपी को लिखा।

केस-२
महिला ने भीमगंज थाने में मामला दर्ज कराया कि पति ने मारपीट व झूठे आरोप लगा घर से निकाल दिया। दो नाबालिग बेटियों को पति ने रख लिया। बाल कल्याण समिति के माध्यम से ७ सितम्बर को अपने साथ ले गई। एक बेटी के साथ कुछ लोगों ने बलात्कार किया। जांच भीमगंज थाने के तत्कालीन प्रभारी हनुमानसिंह चौधरी ने की। अनुसंधान अधिकारी ने चार जनों को गिरफ्तार किया। दूषित अनुसंधान के कारण चारों को दोषमुक्त किया गया। कोर्ट ने थानेदार के खिलाफ कार्रवाई के लिए डीजी को लिखा।

केस-३
एक व्यक्ति को बलात्कार के झूठे मुकदमे में फंसा जेल भेजने और खाली कागजात पर हस्ताक्षर करवाने पर बागोर की तत्कालीन थानाप्रभारी सुमन चौधरी और चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ मांडल न्यायालय ने मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए। परिवादी ने अदालत में इस्तगासा दर्ज करवा कर पुलिसकर्मियों पर आरोप लगाया था। इस मामले की जांच अब मांडल डीएसपी करेंगे।

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भीलवाड़ा. यह तो बानगी भर है। भीलवाड़ा पुलिस अपने ही अनुसंधान में खुद उलझ रही। पुलिसकर्मियों को मुकदमे तक झेलने पड़ रहे। कहीं लापरवाही मानी जा रही तो कहीं दूषित अनुसंधान से आरोपी को बचाव का मौका दिया। पुलिस अधिकारियों को अदालत की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। डेढ़ साल में तेरह पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो चुका है। कई अधिकारियों के खिलाफ अदालत ने लापरवाही और दूषित अनुसंधान मानते हुए पुलिस महानिदेशक को कार्रवाई के लिए लिखा। इससे पुलिस महकमे की किरकिरी हो रही हँै।

इसलिए हो रहा एेसा
पुलिस ठीक से अनुसंधान नहीं करती। प्रभाव में आकर या पर्याप्त दस्तावेज नहीं होने के बाद भी गिरफ्तार कर जेल भेज देती है। ट्रायल में पेश दस्तावेज और गवाह आरोप सिद्ध नहीं कर पाते। नतीजन आरोपी दोषमुक्त होता है। अदालत एेसे आइओ के खिलाफ कार्रवाई को लिखती है।

नहीं करते मॉनिटरिंग, हस्ताक्षर कर लौटाते
अनुसंधान अधिकारी की जांच के बाद मामले में एफआर या चालान की अनुमति के लिए पुलिस के उच्चाधिकारियों के पास फाइल जाती है। उसे फाइल को ठीक नहीं देखा जाता। अधिकारी महज हस्ताक्षर कर थाने को लौटा देते है। इससे बाद में पुलिस को बैकफुट पर आना पड़ता है।

डीएसपी की लापरवाही से तीन माह की जेल
थानाप्रभारी ही नहीं अनुसंधान में पुलिस उपाधीक्षक स्तर के अधिकारी भी लापरवाही बरतते हैं। एेसा ही मामला तत्कालीन सदर पुलिस उपाधीक्षक राजेश आर्य से जुड़ा है। दहेज हत्या के आरोप में कांदा निवासी रामलाल बलाई को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जांच बदली तो एएसपी ने रामलाल को क्लिनचिट दी। बेकसूर रामलाल तीन माह बाद जेल से छूट पाया। उसने डीएसपी आर्य, उनके रीडर समीर सेन समेत कई लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया।

Akash Mathur
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