कोरोना फैलने के लिए हम भी जिम्मेदार, बाजार खुल रहे हैं तो मंदिर क्यों नहीं

प्रशासन की तरफ से दुकानें, बाजार आदि खुलने में छूट मिल रही है तो मंदिर जाने की भी छूट मिलना चाहिए, क्योंकि श्रद्धालुओं को भगवान से अधिक समय तक दूर रखना ठीक नहीं। किसी राजनीतिक का विचार सामने आया है कि पूजा-पाठ व मंदिरों में सामग्री आदि चढ़ाने की अपेक्षा सामग्री गरीबों को बंाटी जाए तो अच्छा रहेगा।

By: rishi jaiswal

Published: 24 May 2020, 08:10 AM IST

भिण्ड. आदिनाथ दिगंबर चैत्यालय जैन मंदिर में ससंघ मौजूद गणाचार्य विराग सागर ने कहा कि वर्तमान में जिस कोरोना से सारी दुनिया के साथ हमारा देश भी जूझ रहा है। इस बीमारी के फैलने में हमारी भी कुछ भूलें हैं। भिण्ड नगर में कितने समय तक एक भी पॉजिटिव केस नहीं था, किन्तु जब से बाहर के लोगों का आना प्रारंभ हुआ तब से यहां भी इस बीमारी ने अपने पैर पसार लिए।

प्रशासन की तरफ से दुकानें, बाजार आदि खुलने में छूट मिल रही है तो मंदिर जाने की भी छूट मिलना चाहिए, क्योंकि श्रद्धालुओं को भगवान से अधिक समय तक दूर रखना ठीक नहीं। किसी राजनीतिक का विचार सामने आया है कि पूजा-पाठ व मंदिरों में सामग्री आदि चढ़ाने की अपेक्षा सामग्री गरीबों को बंाटी जाए तो अच्छा रहेगा।

आचार्य ने कहा कि यह बहुत छोटा विचार है, क्योंकि जैनधर्म कर्मप्रधान है। सारा संसार अपने कर्मों का भोक्ता होता है। हमारी करनी का ही फल हमें मिलता है। आज तक किसी भगवान ने किसी व्यक्ति की हाथ की लकीर या तकदीर को नहीं बदला, बल्कि उपदेश दिया कि तुम जैसा फल बोओगे वैसा फल पाओगे। पुण्य का फल पुण्य और पाप का फल पाप देता है। पुण्य का फल भगवान की पूजा, आराधना से प्राप्त होता है। आज का फल आज ही मिल जाए ये भी यह संभव नहीं है।

आचार्य श्री ने कहा कि आपकी श्रद्धा भक्ति इतनी मजबूत होना चाहिए कि तत्कालता में वह फल प्रदान करने वाली हो। श्रद्धा को बढ़ाने में समय लग सकता है किन्तु उसे गिराने या टूटने में एक क्षण पर्याप्त है। भक्तों का मन भगवान के दर्शन से ही आनंद, प्रसन्नता को प्राप्त करता है। धर्म शाश्वत है, वह कभी नष्ट नहीं होता। मैं यह नहीं कह रहा कि अस्पताल न खुलें वह भी खुलना चाहिए, किन्तु मंदिर भी खुलें जिससे व्यक्ति को भगवान के दर्शन से ऐसी ऊर्जा प्राप्त हो जो ऐसी महामारी, बीमारी को समाप्त करने का कारण बने।

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