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2 अहम पड़ाव : चिंतन-मंथन और बुलडोजर छवि...

यह चिंतन एक ऐसे वक्त पर हो रहा है, जब सत्ता परिवर्तन के झंझावतों से उबरकर शिवराज कई रिकार्ड बनाते हुए फिर 2023 की चुनावी दस्तक पर खड़े हैं। ये ऐसा वक्त भी है जब यूपी मॉडल को मध्यप्रदेश में अपना कर पांव-पांव वाले भैय्या की छवि को बुलडोजर मामा में बदलने की कवायद पूरी सरगर्मी से हो रही है।

भोपाल

Updated: March 27, 2022 10:29:56 pm

विशेष टिप्पणी- जितेन्द्र चौरसिया

पचमढ़ी में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का मंत्रियों के साथ दो दिवसीय चिंतन प्रदेश की सियासत का एक अहम मोड साबित हो सकता है। वजह ये कि यह चिंतन एक ऐसे वक्त पर हो रहा है, जब सत्ता परिवर्तन के झंझावतों से उबरकर शिवराज कई रिकार्ड बनाते हुए फिर 2023 की चुनावी दस्तक पर खड़े हैं। ये ऐसा वक्त भी है जब यूपी मॉडल को मध्यप्रदेश में अपना कर पांव-पांव वाले भैय्या की छवि को बुलडोजर मामा में बदलने की कवायद पूरी सरगर्मी से हो रही है। लगातार सख्त लहजे अपनाकर संवेदनशील मामा से बुलडोजर मामा बनने के लिए शिवराज भी जोर लगा रहे हैं। लेकिन, ऐसे अहम मोड पर दो बातें महत्वपूर्ण है। एक इस चिंतन का अमृत कितना निकलेगा और दूसरा शिवराज की बुलडोजर छवि कितनी असरदार रहेगी। तो, बात पहले चिंतन की।
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यूं तो शिवराज के चिंतन-मंथन का दौर हमेशा ही चलता रहा है। जब-तब बैठकों के दौर पर दौर फिलहाल शिवराज की पहचान बन गए हैं। इसका उजला पक्ष ये कि पूरा सिस्टम वाइब्रेंट बना रहता है, लेकिन नकारात्मक पक्ष ये कि बैठकों की अधिकता और लगातार एक जैसे निर्देशों की अपच सिस्टम को असरदार बनने से रोकती है। लेकिन, अभी मौका दो साल पूरे करने और अगले चुनावी दो सालों का है। इसलिए यह चिंतन-मंथन जरूरी है। बस, इसका मतलब तभी है जब इससे योजनाओं के क्रियान्वयन में कोई बदलाव आए। बातें आगे बढक़र हकीकत का जामा पहने। यह वर्किंग टूरिज्म न होकर यह वास्तविक ट्रांसफार्मेशन साबित हो। इसके लिए सबसे पहली जरूरत क्रियान्वन में सटीकता और उसकी क्रमबद्ध मानीटरिंग की है। इस कारण अब मानीटरिंग व फीडबैक पर ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि इसी के आधार पर 2023 की बिसात तय होगी।
दूसरी अहम बात शिवराज की छवि पांव-पांव वाले से बुलडोजर मामा बनने की, तो यह एक रिस्की फैक्टर है। एक ओर जहां पूरे देश में हार्डकोर हिन्दुत्व की लाइन बढ़ रही है, तो मध्यप्रदेश में भी इसे बढ़ाया गया। इसके लिए सबसे ज्यादा फॉलो उत्तरप्रदेश को किया गया। लवजिहाद, पत्थरबाजी और बलात्कार पर फांसी जैसे कानून लाए गए। अब बुलडोजर की बारी है। उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ की बुलडोजर कार्रवाई खासी सराही गई, तो उसे यहां भी शिवराज ने अपनाना शुरू कर दिया है, लेकिन उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में बहुत अंतर है। यहां भाजपा के तीन कार्यकाल के शासन का अपना अलग किस्सा है। लेकिन, यहां का अतिक्रमण, माफिया और अफसरशाही तीनों उत्तरप्रदेश से जुदा है। इसे ही देखिए कि बुलडोजर चलना शुरू हुआ तो एक कलेक्टर ने आंदोलन करने वाली समाजसेविका के घर पर बुलडोजर चलवा देने की धमकी दे दी। दूसरे कलेक्टर ने आरेापियों के खेत की खड़ी फसल नष्ट करवा दी। इस तरह की कार्रवाईयां क्या शिवराज को फायदा देगी?
भाजपा युग में चुनावी नतीजे जो भी हो, लेकिन संवेदनशील व सरल-सहज व्यक्ति की छवि ही अब तक शिवराज की सबसे बड़ी ताकत रही है। अब बुलडोजर छवि इससे तार-तार कर सकती है। ऐसे में शिवराज दूसरे नेताओं को कॉपी करके कितना सियासी लाभ ले पाएंगे ये सवालों के घेरे में हैं, लेकिन अपनी खुद की छवि से तो उन्होंने अभी तक लाभ ही लाभ पाया है। इसलिए सियासी तौर पर शिवराज के लिए यह रिस्की फैक्टर है। अब आगे इसके क्या नतीजे होंगे अभी नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना तय है कि अगले दो साल शिवराज के लिए फिर अग्निपरीक्षा के ही रहेेंगे।
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