कोरोना के कारण बदल गई 200 सालों की परंपरा, इस बार नहीं होगा हिंगोट युद्ध

प्रशासन ने इस बार हिंगोट युद्ध के लिए अनुमति नहीं दी है।

By: Pawan Tiwari

Updated: 15 Nov 2020, 08:13 AM IST

भोपाल. कोरोना वायरस ने आम आदमी की जिंदगी में बहुत बड़ा बदलाव किया है। कोरोना वायरस के कारण आम आदमी के जीवन में जहां कई बदलाव आया है वहीं, दूसरी तरफ कई रीति रिवाज और परंपराओं में भी बदलाव आया है। मध्यप्रदेश में दीपावली के अगले दिन मनाया जाने वाला हिंगोट युद्ध कोरोना के चलते इस बार नहीं हो पाएगा। हिंगोट मुख्य रूप से मालवा अंचल में मनाया जाता है।

200 साल पुरानी है परंपरा
हिंगोट की परंपरा करीब 200 साल पुरानी है। लेकिन इस बार यह परंपरा नहीं मनाई जाएगी। इंदौर में होने वाले हिंगोट युद्ध पर प्रशासन ने इस बार रोक लगा दी है। कोरोना वायरस के संक्रमण के खतरे को देखते हुए प्रशासन ने ये निर्णय लिया है। बताया जा रहा है कि 200 साल में ऐसा पहली बार हुआ है, जब तय समय पर हिंगोट युद्ध नहीं होगा। परंपरा के अनुसार हिंगोट युद्ध हर साल दीपावली के दूसरे दिन इंदौर के समीप गौतमपुरा में होता था, लेकिन इस बार इसे अनुमति नहीं मिली है।

दो गांवों के बीच होता है युद्ध
हिंगोट युद्ध हर साल दीपावली के दूसरे दिन दो गांवों गौतमपुरा और रूणजी के ग्रामीणों के बीच होता था। इसमें दोनों गांवों के लोग एक-दूसरे पर बारूद से भरे हुए हिंगोट (स्थानीय स्तर पर तैयार खतरनाक पटाखा) फेंकते हैं। अनूठे युद्ध को देखने दूरदराज से लोग पहुंचते हैं।

इस तरह होता है हिंगोट
बताया जाता है कि हिंगोरिया के पेड़ का फल हिंगोट होता है। बड़े नींबू के आकार के इस फल का बाहरी आवरण बेहद सख्त होता है। युद्ध के लिए गौतमपुरा और रुणजी के रहवासी महीनों पहले चंबल नदी से लगे इलाकों के पेड़ों से हिंगोट तोड़कर जमा कर लेते हैं और गूदा निकालकर इसे सुखा दिया जाता है। फिर इसमें बारूद भरकर इसे तैयार किया जाता है। हिंगोट सीधी दिशा में चले, इसके लिए हिंगोट में बांस की पतली किमची लगाकर तीर जैसा बना दिया जाता है। योद्धा हिंगोट सुलगाकर दूसरे दल के योद्धाओं पर फेंकते हैं।

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