Memories: एक कस्बा जो मरा नहीं, आज भी जिंदा है लोगों के दिलों में

30 जून 2004 को डूब गया था हरसूद कस्बा, आज भी सोशल मीडिया पर याद कर रहे हैं लोग...।

By: Manish Gite

Updated: 30 Jun 2020, 02:51 PM IST

भोपाल। कभी इस शहर की आबोहवा को महसूस करने दूर-दूर से लोग आते थे। जो लोग यहां सुकून का जीवन बीते थे, उनका दर्द कोई नहीं समझ सकता। आज वे बेदखल जरूर हुए हैं, लेकिन उन्होंने अपने शहर को अपने सीने में, दिलों में, यादों में और तस्वीरों में जीवित रखा है। इसी शहर में किसी का बचपन बीता, किसी ने जन्म की खुशियां मनाई। कई लोग पढ़-लिखकर देश-विदेशों तक पहुंच गए। 700 साल पुराना यह शहर अब नक्शे से भी गायब हो चुका है। 30 जून 2004 को ही यह शहर पूरी तरह से जल मग्न हो गया था।

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हरसूद के विस्थापित लोग कहते हैं कि नर्मदा नदी पर बने बांध की गहराइयों में यह शहर भले ही मर गया है, लेकिन दिलों में इसकी यादें अमर हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहेंगी। आज भी हरसूद की हाबोहवा में पले-बढ़े लोग अपने कस्बे को याद करते हैं तो उनके मन में एक दर्द का भाव उमड़ पड़ता है, उनके जख्म फिर हरे हो जाते हैं।


नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर डैम पर सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा का अनावरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। जब-जब भी नर्मदा पर बने बांधों का जिक्र होता है तो हरसूद में अपना सबकुछ गंवाने वाले लोग सिहर जाते हैं।

 

700 वर्षों पुराना है इसका इतिहास
13वीं शताब्दी के आसपास राजा हर्षवर्धन ने हरसूद को बसाया था। हर्षवर्धन के कार्यकाल में हरसूद राज्य की राजधानी रहा। अब यह नर्मदा के पानी में पूरी तरह से डूब चुका है।


भोपाल से 200 किलोमीटर दूर था हरसूद कस्बा
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 200 किलोमीटर दूर था हरसूद कस्बा। कस्बे के लोग छनेरा, खिरकिया, हरदा, खंडवा, इंदौर और भोपाल तक बसते चले गए। हालांकि यहां के लोगों को विस्थापन से पहले मुआवजा भी दिया था। लेकिन, वो नाकाफी रहा।

 

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सवा लाख लोगों का विस्थापन
हरसूद शहर के डूब में आने से पहले करीब सवा लाख से अधिक लोगों को अपने ही घरों से बाहर कर दिया गया था। यह एशिया का सबसे बड़ा विस्थापन कार्य था। इस डूब में हरसूद के साथ ढाई सौ गांव के बाशिंदे भी आ गए। लेकिन, डूबने से पहले इसके हजारों लोगों को खंडवा के पास छनेरा में बसा दिया गया था। इस विस्थापन को एशिया का सबसे बड़ा विस्थापन माना जाता है।


दुनियाभर में हुआ था विरोध
हरसूद के डूबने के लिए नर्मदा पर बने इंदिरा सागर बांध और सरदार सरोवर बांध भी जिम्मेदार माने जाते हैं। इन बांधों के कारण ही यह शहर अब लुप्त हो गया है। 31 जनवरी 1989 को सरदार सरोवर बांध बनने का विरोध भी हुआ था। इस आंदोलन में पर्यावरण के लिए काम करने वाले बाबा आमटे, सुंदरलाल बहुगुणा, शिवराम कारन्त, स्वामी अग्निवेश, मेघा पाटकर और शबाना आजमी जैसी हस्तियों ने भी विरोध किया था।

 

यह भी है खास
नए हरसूद (छनेरा) पांच हजार लोगों को बसाने की योजना थी, लेकिन करीब 23 सौ परिवार ही पहुंचे। लोगों को सपना दिखाया गया था कि छनेरा को चंडीगढ़ की तर्ज पर बसाया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो काफी लोग अलग-अलग शहरों में बस गए। लोगों को मकान के स्थायी पट्टे भी नहीं दिए गए।


याद आती है तो नम होती हैं आंखें
हरसूद उजड़ जाने के बाद अलग-अलग शहरों में बस गए लोगों की आंखें 30 जून को नम हो जाती है। इसके अलावा जब-जब भी नर्मदा बेल्ट में बने बांधों का जिक्र होता है तो पुराने जख्म हरे हो जाते हैं। कई बुजुर्ग अपने बच्चों को पुराने हरसूद का भूगोल समझाते हैं। वो कहानी सुनाते हैं। इस बार भी सरदार सरोवर पर बनी वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा के अनावरण के दिन

 

हरसूद को डूबते आंखों से देखा
हरसूद से विस्थापित होने के बाद भोपाल में रह रहे अरविंद शर्मा भी उन लोगों में से हैं जो अपनी यादों को नहीं भूलना चाहते। अक्सर ही वे अपने पूर्वजों की भूमि को याद करते हैं। वे अक्सर ही फेसबुक पर हरसूद में बिताए हुए बचपन की यादों को सभी के साथ साझा करते हैं। अरविंद कहते हैं कि अब तो मां नर्मदा को सौंप दिया हरसूद, लेकिन वो मरा नहीं हमारे दिलों में आज भी जिंदा है।

 

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यहां देखें अरविंद शर्मा की फेसबुक पोस्ट....।

मेरा प्यारा अपना हरसूद आज 16 वर्ष हो गए
यादें शेष...

आज से 16 साल पहले आज ही का दिन था। 30 जून 2004. जब हमने अपने प्यारे शहर हरसूद को हमेशा-हमेशा के लिए माँ नर्मदा की उतंग लहरों को सौंप दिया था। हरसूद हमारे लिए बचपन का मीत, शिक्षा की पाठशाला, युवावस्था का अल्हड़पन, रिश्तों का तानाबान ही नहीं, बल्कि हम आज जहां कहीं भी हैं, जैसे भी हैं उसकी जड़ें आज भी मेन रोड, टेकरा मोहल्ला, किशनपुरा, घोसी मोहल्ला, गड़ी, जीन मोहल्ला, राम मंदिर रोड़, काशिव डॉक्टर की गली, गांधी चौक, सिविल लाइन से लेकर स्टेशन तक फैली हुई है। इन जड़ों को माँ नर्मदा का पावन जल निरंतर सींच रहा है। पोषण कर रहा है। इन पंद्रह वर्षों में हरसूद का वह वैभवशाली स्वरूप धरती पर भले ही नज़र नही आ रहा है, परन्तु जड़ें अंदर ही अंदर आज भी अमरबेल की तरह जीवटता के साथ सजीव है।

प्रकृति ने भले ही हमसे हमारी बहुमूल्य विरासत छीन ली हो, परन्तु हरसूद की सभ्यता,संस्कृति, भाई-चारा, सौहार्द, रिश्ते-नाते, उत्साह, उमंग, अपनापन आज भी हर हरसूद वासी की रगों में उसी आवेग से दौड़ रहा है।जितना पंद्रह वर्ष पहले दौड़ता था।

हरसूद के हर वाशिंदे के सपने में आज भी बावड़ी की घिरनियों की गड़गड़ाहट, बोड़म और नन्हें की बैंगियो की कदमताल, श्रावण सोमवार पर शिवालयों की घंटियों का नाँद, तांगों की चहल-पहल, डोल ग्यारस की रेलमपेल, रात ठीक 9 बजे राममंदिर से गूंजती आरती की स्वर लहरी, बेसिक शाला, हाईस्कूल, बस्तिशाला के रास्ते, कमल टॉकीज का रूपहला पर्दा, दाना बाबा की जय का उदघोष आज भी हरसूद के सपने से जगा देता है।

हरसूद न डूबा है, न उजड़ा है, न विस्थापित हुआ है। हरसूद आज भी हम सब में आबाद है। जिंदा है। हराभरा है।

 

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