ज्यादा एंटीबायोटिक देने पर लगाम लगाएगा एम्स

अच्छी पहल: इंदौर के चिकित्सकों को दी ट्रैनिंग, अब अन्य जिलों में भी बताएंगे एंटीबायोटिक के नुकसान

By: Ram kailash napit

Published: 30 Dec 2018, 03:03 AM IST

भोपाल.डॉक्टर मरीज की बीमारी जल्दी ठीक करने के चक्कर में बेवजह एंटीबायोटिक दवाएं लिखते हैं। इससे बीमारी तो ठीक हो जाती है लेकिन एंटीबायोटिक का बड़ा दुष्प्रभाव भी होता है। खासकर वायरल डिसीज में एंटीबायोटिक की विशेष जरूरत नहीं होती है, लेकिन डॉक्टर फिर भी इसे लिखते हैं। 25 फीसदी बीमारियां ऐसी हैं जो सिर्फ पैरासीटामॉल या घरेलू उपचार से ठीक हो जाती है। इसके बावजूद डॉक्टर्स मरीजों को हैबी एंटीबायोटिक लिख रहे हैं। ऐसे में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स भोपाल ने एंटीबायोटिक के बढ़ते उपयोग पर रोक लगाने की पहल की है। इसके लिए एम्स प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में एंटीबायोटिक के उपयोग को कैसे कम करे इसके लिए डॉक्टरों को टै्रनिंग देगा। इसकी शुरुआत शुक्रवार को इंदौर से की गई। यहां एम्स के चिकित्सकों ने सरकारी डॉक्टरों को ट्रैनिंग दी।

अब असर नहीं करती एंटीबायोटिक
कुछ समय पहले एम्स दिल्ली और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने एंटीबायोटिक के असर पर एक शोध किया था। शोध के मुताबिक बेतहाशा उपयोग से एंटीबायोटिक का असर या तो खत्म हो चुका है या कम हो गया है। हालांकि राहत की बात यह है कि पुराने एंटीबायोटिक जिनका उपयोग कम हो रहा है , वे फि र से प्रभावी हो गए हैं।

 

घट रही बैक्टीरिया के प्रति संवेदनशीलता
एनएचएम के संयुक्त संचालक डॉ.़ पंकज शुक्ला बताते हैं कि रिसर्च से प्राप्त आंकड़े भविष्य के लिए खतरे की घंटी हैं, क्योंकि एंटीबायोटिक के गैरजरूरी और बेतहाशा इस्तेमाल से इनकी बैक्टिरिया के प्रति सेंसिटिविटी घट रही है। इससे मरीज को ठीक होने में भी ज्यादा समय लग रहा है, वहीं इन दवाओं का साइड इफेक्ट भी देखने को मिल रहा है।

 

इन बीमारियों की दवाओं का होता है दुष्प्रभाव
- टीबी की दवाओं का लीवर पर होता है प्रभाव। इसके अलावा कान और आंख भी प्रभावित हो जाता है। इसलिए टीबी की दवा सेवन करते समय मरीज को सलाह दी जाती है कि वह लीवर की नियमित जांच कराते रहे।
- टायफ ायड की दवा के दुष्प्रभाव से बोन मैरो डिप्रेशन हो जाता है। बोन मैरो में आरबीसी और डब्लूबीसी खराब होने लगता है जिससे मरीज में खून की कमी हो जाती है।
- बुखार और डायरिया की दवाओं का साइड इफेक्ट होता है कि दवा से शरीर के अच्छे बैक्टीरिया भी मर जाते हैं जिससे मरीज में रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है।
- पेट से संबंधित बीमारियों में हाई डोज इस्तेमाल होने वाली से किडनी और लीवर खराब होने की आशंका हो जाती है।

शोध में यह निकले थे तथ्य
- रिसर्च में अस्पताल में भर्ती मरीजों पर एंटीबायोटिक्स के असर का अध्ययन किया गया।
- सबसे ज्यादा उपयोग की जाने वाली एंटीबायोटिक जैसे एंपिसिलीन, एमॉक्सीसिलीन, सिफ जोलिन, सिफेप्राइम, सिफ्रि एक्सोन आदि की प्रभावशीलता 50 प्रतिशत के नीचे पहुंच गई।
- वर्षों पहले अप्रभावी हुआ क्लोरेम्फेनिक ल की प्रभावशीलता 63 फ ीसदी तक पाई गई। भर्ती मरीजों में सर्वाधिक प्रभावी कोलिस्टिन पाया गया।

एंटीबायोटिक्स की प्रभावशीलता

एंटीबायोटिक - कितनी प्रभावी (प्रतिशत मे)
1. कोलिस्टिन - 89
2. इंपीनेम - 70
3. पिपरेसिलीन - 64
4. क्लोरेम्फेनीकूल - 63
5. जेंटामाइसिन - 60
6. एजट्रियोनम - 59
7. सेफ्टाजिडाइम - 52
8. लीवोफ्लोक्सेसिन - 52
9. डोरीपेनम - 48
10. सिफ्रि एक्सोन - 46
11. मीरोपेनम - 46
12. कोट्राइमोक्सेजोल - 42
13. सिफेपाइम - 40
14. सिफेजोलिन - 26
15. एमॉक्सीसिलीन - 17
16. एंपिसिलीन - 12

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