50 साल में खत्म हो जाएगी अजंता की पेंटिंग्स, एएसआई में संरक्षक नहीं अफसर बैठे हैं

फोटोग्राफर और चित्रकार प्रसाद पवार पिछले 27 सालों से अजंता की गुफाओं में बनी पेंटिंग्स के संरक्षण पर कर रहे काम

By: hitesh sharma

Updated: 19 Jan 2019, 09:22 AM IST

भोपाल। नासिक के चित्रकार/फोटोग्राफर प्रसाद पवार का शुक्रवार को बैठक द आर्ट हाउस में स्पेशल सेशन आयोजित किया गया। प्रसाद पिछले 27 सालों से अजंता की गुफाओं की पेंटिंग्स के संरक्षण और रिरेस्टोरेशन के लिए काम कर रहे हैं। सेशन में उन्होंने बताया कि गुफाओं में पेंटिंग्स की स्थिति बहुत खराब है। 50 साल बाद शायद ही देखने को मिले। हमारी 2000 हजार साल पुरानी विरासत को बचाने में एएसआई और अन्य कोई एजेंसी की कोई दिलचस्पी नहीं है।

इन गुफाओं को बनाने में करीब 800 साल का वक्त लगा। अभी हमारे पास ऐसी कोई तकनीक नहीं है, जिससे इनका क्षरण रोका जा सके। किसी भी एजेंसी ने इस तकनीक को खोजने में भी दिलचस्पी नहीं ली। औरंगाबाद के नवाब ने विशेष लेप लगाकर इनके संरक्षण का प्रयास किया था। इसी कारण आज यहां पेंटिंग्स यलो शेड में दिखाई देती है। एएसआई की नजर में उनकी भी वैल्यू है, लेकिन खत्म हो चुकी विरासत को अगली पीढ़ी कैसे समझेगी।

फोटोग्राफी परमिशन में लगे 18 साल
प्रसाद का कहना है कि 1989 में मैं बीए फाइन आट्र्स का स्टूडेंट्स था। उस दौरान ही मुझे अजंता की गुफाओं में दिलचस्पी होने लगी। मैं वहां अपने टीचर के साथ गया तो देखा, पेंटिंग्स से प्लास्टर और रंग निकल रहा है। कई पेंटिंग्स पूरी तरह मिटने से अब प्राचीन कहानियां विजिटर्स को समझ भी नहीं आती। मैंने तभी ये निर्णय लिया कि मैं इन्हें बचाने पर काम करूंगा। मैंने एएसआई से फोटोग्राफी की अनुमित मांगी, उन्होंने इंकार कर दिया। 18 साल तक कोशिश करने के बाद अनुमति मिल पाई। मैं विश्व में ऐसा अकेला व्यक्ति हूं, जो अजंता की पेंटिंग्स के संरक्षण के लिए काम कर रहा हूं।

एक फोटो के लिए 365 दिन का इंतजार
प्रसाद ने बताया कि गुफाओं में हमेशा अंधेरा रहता था। मैंने सोचा कि जब चित्रकार ने इन्हें अंधेरे में बनाया है तो मैं भी ऐसा कर सकता है। मुझे फ्लेश या लाइट्स यूज करने की अनुमति नहीं थी। विंडो से कभी पांच फीट तो कभी दस तो कभी बीस फीट तक रोशनी आती थी। मैं उस लाइट के भरोसे फोटो क्लिक करता था। कई बार तो उसी जगह रोशनी आने में 365 यानी एक साल लग जाता। मैं उस पल का इंतजार करता था। सूर्य की रोशनी के हिसाब से मैंने पूरी डॉक्यूमेंट्री बनाई। मैं इन फोटोग्राफ्स की मदद से अंजता के बिखरे हिस्सों को तलाशने की कोशिश कर रहा हंू।

चाइना से लेकर तिब्बत तक की स्टडी
प्रसाद ने बताया कि मैं दो हजार साल के इतिहास को खंगालने की कोशिश की। देशभर में करीब 11 हजार किलोमीटर की यात्रा की। चीन और तिब्बत को भी जोड़ा। मैंने पता लगया कि उस कालखंड में किस-किस जगह इस तरह की कला का प्रयोग किया गया। मैंने पाली, ब्राह्मी, तेलगु, तमिल और संस्कृत जानने वालों की मदद ली। मैंने दीवारों पर लिखे गए शब्द-आकृति का मतलब समझा और कल्पनाओं में खोई हुई संस्कृति को खोजने की कोशिश की। उसी हिसाब से स्कैच भी तैयार किए गए हैं। करीब चार लाख स्क्वेयर फीट का काम होना है। दस सालों में 14 हजार स्क्वेयर फीट के संरक्षण पर काम किया है।

आज भी ऐसे तकनीक नहीं जो दो हजार साल तक चले
प्रसाद को अजंता की गुफा नंबर-17 में पेंटिंग्स से निकले कलर्स मिले। जांच में पता चला कि ये कलर्स फूल, वनस्पति और स्टोन से तैयार किए गए हैं। हमें ये नहीं पता कि कलर कॉम्बिनेश किस तरह तैयार किए गए। आज भी ऐसी कोई तकनीक नहीं जो इस तरह के कलर बना सके जो दो हजार सालों तक खराब न हो। अजंता की गुफाओं में जो फैशन दर्शाया गया है, उसे आज फ्रांस की फैशन स्ट्रीट पर देखा जा सकता है। मल्टी स्टोरी से लेकर कलर कॉम्बिनेशन तक का कॉन्सेप्ट हम दो हजार साल पहले ही सीख चुके थे।

hitesh sharma Reporting
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