एक चीफ मिनिस्टर ऐसा, जिसके घर की छत से टपकता था पानी, फटा कुर्ता सिलकर पहुंचते थे विधानसभा

राजमाता मिलने पहुंची तो बोले - ये टपकती छत ही मेरे राजनीतिक जीवन का इनाम है

By: rishi upadhyay

Published: 13 Mar 2018, 11:43 AM IST

भोपाल। त्रिपुरा में हुए चुनाव के बाद भारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल की, लेकिन इस समय चर्चा में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार हैं। 20 साल तक सत्ता में रहने के बाद माणिक सरकार को लेकर चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि माणिक सरकार के पास अब रहने के लिए अपना घर तक नहीं है। दरअसल माणिक सरकार देश के सबसे सादे नेताओं में से एक हैं, इससे पहले भी उनकी सादगी की चर्चा कई बार हो चुकी है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अपना सरकार घर खाली करने के बाद अब सीपीएम दफ्तर में रहेंगे।

 

सीपीएम दफ्तर के ऊपर दो कमरों का एक फ्लैट है, जहां माणिक सरकार और उनकी पत्नी रहेंगी। ये बात बाकी नेताओं के लिए मिसाल जरूर है, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जबकि कोई मुख्यमंत्री अपने पद से निवृत होने के बाद इस तरह की सादगी का मिसाल बना हो। माणिक सरकार से पहले मध्यप्रदेश में ऐसा ही नजारा देखने को मिल चुका है।

 

बात सात दशक पहले की है, जब मध्यप्रदेश को मध्यभारत प्रांत के नाम से जाना जाता था। इस प्रांत के मुख्यमंत्री पद पर आसीन थे मध्यभारत के पहले मुख्यमंत्री लीलाधर जोशी। खांटी कांग्रेसी और गांधीवादी विचारधारा वाले लीलाधर जोशी की सादगी अपने आप में ही प्रशंसनीय है। सत्ता और पद उनके मूल्यों के आगे कहीं छोटे थे। हमेशा सादा जीवन, उच्च विचार की अवधारणा पर चलने वाले जोशी जी ने एक बार नेतृत्व पर सवाल उठते ही बिना देर किये इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद अपना बिस्तर और पेटी उठाकर चल दिए और कभी भी मुड़कर नहीं देखा।

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सत्ता का लोभ न पद का अहंकार, सिर्फ सादगी की संपत्ति थी पास
लीलाधर जोशी को मध्यभारत राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के चयन के बाद उन्हें ये जिम्मेदारी मिली। लेकिन कुछ समय बाद कांग्रेस विधायक दल में ही उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया। जैसे ही इसकी सूचना जोशीजी को मिली, उन्होंने तुरंत मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के पेशकश कर दी। लेकिन देश के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने उन्हें ऐसा करने से रोका। वल्लभ भाई के कहने पर उन्होंने उस वक्त इस्तीफा नहीं दिया।

 

लेकिन कुछ समय बाद फिर उनके नेतृत्व को लेकर फिर अविश्वास की मुहिम चली। सरदार पटेल ने उन्हें कहा कि राजनीति में दांव पेंच चलते ही रहते हैं। आप पद न छोड़ें। लेकिन जोशीजी दूसरी ही मिट्टी के बने थे। उन्होने कहा कि जब आपस में ही विश्वास न हो तो पद पर रहने से क्या फायदा ? उन्होने तुरंत त्यागपत्र सौंप दिया और इंदौर के मालवा हाउस में तांगा मंगवाकर अपनी अटैची-बिस्तर रख रात की पैसेंजर से अपने गृहनगर शुजालपुर पहुंच गए। मुख्यपमंत्री की कुर्सी की हैसियत उनके लिए इतनी ही थी।

 

छवि से झलकता था सादापन
मध्यभारत जैसे नए बने राज्य का मुख्यममंत्री बनने को लेकर भी वे एकदम सहज थे। ये बात शायद आज के नेताओं के गले न उतरे, लेकिन ये सच है कि मुख्यमंत्री जैसे ताकतवर पद के शपथ ग्रहण समारोह में भी लीलाधर जोशी बिल्कुल सामान्य होकर पहुंचे थी। यहां तक कि रोजाना पहने जाने वाले कुर्ता-जैकेट के अलावा बेतरतीब बढ़े बाल और कुछ दिनों की दाढ़ी भी उनके चेहरे पर थी। उनके मित्रों और करीबियों ने उनसे शपथ ग्रहण वाले दिन दाढ़ी बना लेने का आग्रह भी किया, लेकिन उन्होंने इसके लिए मना कर दिया।

 

दरअसल मध्यभारत राज्य की ग्वालियर और इंदौर संयुक्त राजधानी हुआ करती थी। लीलाधरजी को मुख्ययमंत्री पद की शपथ ग्वालियर में लेनी थी। उस जमाने में ग्वालियर के स्वतंत्रता सेनानी और लीलाधरजी के मित्र डूंगरसिंह और गौतम शर्मा ने उनसे कहा कि शपथ लेने के पहले आप ठीक से बाल बनवा लें, नए कपड़े और पैरों में ठीक-ठाक जूतियां पहन लें। फक्कड़पन से जीने वाले लीलाधरजी को यह आग्रह भला कैसे रास आता। उन्होने पलटकर पूछा कि क्या मेरी शादी होने वाली है, जो मुझे इस तरह सज-धज कर शपथ दिलवाने ले जाया जा रहा है? मैं एक राजनीतिक दायित्व स्वीकार करने जा रहा हूं और तुम लोग मुझे दूल्हा बनाना चाहते हो? मैं जैसा हूं, मुझे वैसा ही रहने दो।

 

 

अपने काम के लिए नहीं लिया किसी का सहारा
लीलाधर जोशी की धर्मपत्नी का निधन काफी पहले हो जाने के कारण उन्हें खाना बनाने का अभ्यास और आदत थी, जो आखिर तक बनी रही। आजादी के आंदोलन के दौरान जब वो जेल में थे, वहां भी जोशीजी और साथी मित्र हाथ से बाटियां सेंक लेते थे। सब्जी न हो तो नमक मिर्च से ही काम चलाया जाता था। लीलाधरजी दो बार मप्र से सांसद रहे। लेकिन दिल्ली में रहकर भी खाना अपने हाथ से ही बनाते थे।

 

दिल्ली में उनका मन कभी नहीं लगा, उनका मन अपने गांव में ही रमता था। जोशीजी के करीबी बताते हैं कि उनके पास दो कुर्ते और दो बंडियां थीं, जिन्हें आजकल जैकेट कहा जाता है। चूंकि वे अपना सारा काम खुद ही करते थे, ऐसे में समय पर कुर्ते वगैरह में बटन या पैबंद ठीक से लगे हों, यह कतई जरूरी नहीं था। एक बार किसी ने उनसे पूछा कि आप बंडी (जैकेट) क्यों पहनते हैं तो जोशीजी का जवाब होता- इससे कुर्ते का फटापन ढंक जाता है।

 

 

जोशीजी की सादगी और ईमानदारी का सम्मान समाज के हर वर्ग में था। इस बात का अंदाजा इस तरह लगाया जा सकता है कि राजमाता विजयाराजे सिंधिया भी उनका बेहद आदर करती थीं। कारण लीलाधर जी जब मध्यभारत प्रांत के सीएम थे, उस वक्त महाराजा जीवाजी राव सिंधिया राज्य के राजप्रमुख हुआ करते थे।

 

 

राजमाता मिलने पहुंची तो बोले - ये टपकती छत ही मेरे राजनीतिक जीवन का इनाम है

1989 में एक बार राजमाता भाजपा के एक कार्यक्रम के सिलसिले में शुजालपुर आईं तो उन्होने लीलाधरजी के स्वास्थ्य बारे में पूछा। स्थानीय भाजपा नेता नहीं चाहते थे कि राजमाता किसी कांग्रेसी नेता से मिलने जाएं, क्योंकि इससे गलत राजनीतिक संदेश जा सकता था। लेकिन राजमाता ने साफ कह दिया कि वे लीलाधरजी से हर हाल में मिलेंगी और उनका पता भी पूछा। लीलाधरजी उन दिनों शहर से दूर एक खेत में खपरैले मकान में रहते थे, जो बारिश में कई जगह से टपकता था। घर में सामान भी गिनती का ही था। एक तखत था और एक बिस्तर। इसके अलावा तीन चार तगारियां रखी थीं। ताकि ऊपर से टपकती छत का पानी उनमें समेटा जा सके।

 

राजमाता लीलाधर जी के घर पहुंचीं। नमस्कार किया और पूछा कि जोशीजी यह सब क्या है? जोशीजी ने अविचल भाव से उत्तर‍ दिया- यह टपकती छत मेरे राजनीतिक जीवन का इनाम है। ये तगारियां मेरी ईमानदारी के तमगे हैं और मैं इसे खुशी से स्वीकार करता हूं। जोशीजी खांटी कांग्रेसी थे और उनका विश्वास गांधीवाद में था। वे आजीवन खादी न सिर्फ पहनते रहे बल्कि अंतिम यात्रा के लिए भी उन्होने खादी का इंतजाम पहले ही कर रखा था। एक तिरंगा झंडा और खादी का थान इसके लिए उन्होंने रिजर्व रखा था। संयोग से उनके एक मित्र और स्वतंत्रता सेनानी का निधन हो गया। उनके कफन के लिए भी खादी की दरकार थी। जोशी ने अपने पास सहेज कर रखा तिरंगा और खादी का थान मित्र की अंतिम यात्रा के लिए दे दिया। इसके बाद तत्काल बाजार गए और नया तिरंगा और खादी का थान अपने लिए ले आए।

 

उन्होने पूरी जिंदगी सरलता और निरअहंकारिता में गुजारी। उन्होने अपनी महानता का कभी कोई दावा नहीं किया, लेकिन उन मूल्यों को जिया, जो आज की राजनीति और समाज व्यवस्था में दुर्लभ है। जोशीजी ने सहजता, मूल्यनिष्ठता और स्वावलंबन को बिना यह सोचे जिया कि वे कोई दौलत पीछे छोड़कर जा रहे हैं या नहीं, बिना यह देखे कि उनके फैसलों से सत्ता का वैभव छिन जाने का खतरा है और बिना यह बूझे कि उनकी सरलता का लोग क्या राजनीतिक-सामाजिक अर्थ निकाल रहे हैं।

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