जीआइ टैग के लिए मजबूती से होगा बासमती का दावा

मद्रास हाईकोर्ट से मिला स्टे, प्रदेश में 80 हजार किसानों को मिलेगा फायदा...

By: Krishna singh

Published: 25 Apr 2018, 07:36 AM IST

भोपाल. प्रदेश सरकार बासमती चावल पर अपने हक की लड़ाई और मजबूती से लड़ेगी। वह बासमती के जीआइ टैग को छीनने के एपीडा के फैसले पर मद्रास हाईकोर्ट से स्टे मिलने के बाद उत्पादन के रेकार्ड सहित अन्य तथ्यों को अपडेट कर रही है।

यह प्रक्रिया दो-तीन महीने चलेगी। ज्योलॉजीकल इंडीकेशन इन इंडिया (जीआइ-रजिस्ट्रार) ने १५ मार्च को फैसला दिया था कि बासमती का जीआइ-टैग मध्यप्रदेश को नहीं दिया जा सकता। क्योंकि, इसके उत्पादन के प्राचीन रेकार्ड कमजोर हैं।

इस फैसले को प्रदेश सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जहां से २३ अप्रैल को स्टे मिल गया है। इसके बाद अब वापस मद्रास हाईकोर्ट में सुनवाई होगी।

 

ये होगा स्टे का असर
मध्यप्रदेश में बासमती उगाने वाले ८०००० किसान अपने चावल को बासमती के नाम से ही बेच पाएंगे। जीआइ टैग छिनने के फैसले के बाद यह चावल बासमती के नाम से बेचने पर रोक लग जाती, लेकिन अब मद्रास हाईकोर्ट से स्टे मिलने के कारण एेसा नहीं होगा।

ज्योलॉजीकल इंडीकेशन इन इंडिया (जीआइ-रजिस्ट्रार) ने १५ मार्च को फैसला दिया था कि बासमती का जीआइ-टैग मध्यप्रदेश को नहीं दिया जा सकता। क्योंकि, इसके उत्पादन के प्राचीन रेकार्ड कमजोर हैं।

 

यहां माना है बासमती
ज्योलॉजीकल इंडीकेशन इन इंडिया ने पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में बासमती की किस्म मानी है। मध्यप्रदेश में बड़े पैमाने पर वर्ष-१९०८ से बासमती होता है, लेकिन उसे नकार दिया गया।

सरकार ने 1908 से अब तक बासमती की खेती प्रदेश के १३ जिलों में होने के दस्तावेज पेश किए थे। मुरैना, भिंड, ग्वालियर, श्योपुर, दतिया, शिवपुरी, गुना, विदिशा, रायसेन, सीहोर, होशंगाबाद, जबलपुर और नरसिंहपुर में बासमती का उत्पादन होता है। वैसे प्रदेश में बासमती का उत्पादन मुगल सम्राट अकबर के समय मालवा में होने का भी उल्लेख आता है।

 

मध्यप्रदेश का बासमती इसी नाम से बेचा जा सकेगा। प्रदेश की इस पहचान व किसानों के हित में सरकार कोर्ट फिर पूरे केस को मजबूती से रखेगी।
- डॉ. राजेश राजौरा, प्रमुख सचिव, कृषि विभाग

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