MP polls 2019: इन दिग्गजों के लिए कांटों भरी चुनावी डगर, उस पर भितरघात का खतरा, जानिए कैसे पार लगेगी नैया...

मध्यप्रदेश लोकसभा चुनाव 2019: बीजेपी और कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती, रूठों को साधने में आ रहा पसीना

By: KRISHNAKANT SHUKLA

Published: 26 Mar 2019, 09:43 AM IST

जितेन्द्र चौरसिया,भोपाल. कांग्रेस-भाजपा ने लोकसभा चुनाव के लिए पहली किस्त के प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। इसमें कहीं सीट बदलने से दिग्गज नेता का सियासी कैरियर दांव पर है तो कहीं भितरघात का भंवर उनकी नैया को डगमगा रहा है।

सबसे ज्यादा कांटों भरी राह पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की है, क्योंकि उनके सामने 35 साल से भाजपा का अभेद्य गढ़ बनी भोपाल सीट को जीतने की चुनौती है। वहीं, भाजपा के भी कुछ दिग्गजों की राह आसान नजर नहीं आ रही है।

दिग्विजय सिंह - भोपाल से दिग्विजय का उतरना नए समीकरण रच रहा है। पिछले चुनाव में कांग्रेस को गोविंदपुरा और हुजूर में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था। इस बार भी इन दोनों इलाकों को साधने की चुनौती रहेगी। उत्तर व मध्य कांग्रेस के क्षेत्र हैं।

ये बाधा - हिन्दुत्व-राष्ट्रवादी वर्ग में विरोध। संघ से अदावत। भाजपा का चुनाव को राष्ट्रवाद बनाम दिग्विजय बनाना। पार्टी में गुटबाजी का विरोध। सुपर सीएम की छवि से विरोधी बढ़े।
ये सकारात्मक - एससी-एसटी वोटबैंक में बड़ी सेंध। मुस्लिम वोट एकजुट होंगे। तीन विधायक (दो मंत्री) भोपाल से। बेटे जयवद्र्धन सिंह भी मंत्री हैं।

Digvijay Singh
Digvijay Singh IMAGE CREDIT: Digvijay Singh

कांतिलाल भूरिया - रतलाम-झाबुआ कांग्रेस का गढ़ है। यहां कांतिलाल को खतरा भितरघात से है। पूर्व विधायक जेवियर मेढ़ा विरोध में हैं। मोदी लहर के बाद इसी सीट पर देश में पहले उपचुनाव में कांग्रेस को जीत मिली थी। विधानसभा चुनाव में 8 में से 3 सीट पर कांग्रेस की बढ़त है।

ये बाधा - भितरघात। जेवियर मेढ़ा सहित अन्य का विरोध। बेटे विक्रांत के विधानसभा चुनाव हारने से मनोवैज्ञानिक नुकसान। क्षेत्र में संघ की पकड़ बढ़ी। जयस का दखल।
ये सकारात्मक - लगातार सक्रिय। राजनीतिक रसूख है। आदिवासी वोटबैंक में पकड़। भाजपा के दिलीप सिंह भूरिया के निधन के बाद उतना मजबूत प्रतिद्वंद्वी का न होना।

Kantilal Bhuria
Kantilal Bhuria IMAGE CREDIT: Kantilal Bhuria

मीनाक्षी नटराजन - 2014 में मोदी लहर में मीनाक्षी से यह सीट चली गई थी। मंदसौर गोलीकांड के बाद कांग्रेस के यहां बढ़त बनाने के आसार थे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। विधानसभा चुनाव में 8 में से 7 सीटें भाजपा ने जीती। किसानों का गुस्सा भुनाने में कांग्रेस विफल रही।

ये बाधा - क्षेत्रीय गुटबाजी। किसानों के गुस्से को न भुना पाना। अफीम-डोडाचूरा कारोबार पर अंकुश और दखल न होना। भाजपा-संघ का वर्चस्व लगातार बढऩा।
ये सकारात्मक - पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की कोर टीम में होना। मिलनसार व्यक्तित्व। क्षेत्र में सक्रियता। भाजपा के अंदरूनी विवादों का फायदा मिल सकता है।

Meenakshi Natarajan
Meenakshi Natarajan IMAGE CREDIT: Meenakshi Natarajan

नरेंद्र सिंह तोमर- ग्वालियर सीट बदलकर मुरैना से लडऩे के दांव पर ही जीत-हार टिकी है। विधानसभा चुनाव में ग्वालियर संसदीय क्षेत्र की 8 में से 7 सीट पर कांग्रेस आगे रही। हालात मुरैना में भी ऐसे ही हंै, लेकिन यहां एंटी इंकम्बेंसी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

ये बाधा - मुरैना सांसद रहे हैं। क्षेत्र में नाराजगी बढऩे पर 2014 में सीट छोड़ ग्वालियर से लड़े। यहां हालात बिगड़े तो फिर मुरैना का रुख किया। मौकापरस्ती से कार्यकर्ता खफा हैं।
ये सकारात्मक - मुरैना में अनूप मिश्रा के विरोध का फायदा तोमर को मिल सकता है। ग्वालियर की तुलना में एंटी इंकम्बेंसी कम है। अंचल में कद्दावर नेता की छवि।

Narendra Singh Tomar
Narendra Singh Tomar IMAGE CREDIT: Narendra Singh Tomar

राकेश सिंह - जबलपुर भाजपा का गढ़ है। राकेश सिंह के सारे समीकरण परंपरागत वोटबैंक पर निर्भर हैं। फिलहाल पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की करीबी राकेश की मुश्किलें आसान कर रही है, लेकिन कांग्रेस कठिन सीटों पर मजबूत प्रत्याशी लाने की रणनीति अपना रही है।

ये बाधा - लोकप्रिय चेहरा न होना। मिलनसार व सहज उपलब्ध नहीं। क्षेत्रीय पकड़ में कमी। महाकौशल मुख्यमंत्री कमलनाथ का प्रभाव क्षेत्र होने से कांग्रेस यहां फोकस करेगी।
ये सकारात्मक - प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते संगठन का साथ। अमित शाह का सपोर्ट। भाजपा का गढ़ होना। परंपरागत वोटबैंक का साथ। कांग्रेस में मजबूत प्रत्याशी न होना।

Rakesh Singh

नंदकुमार सिंह चौहान - खंडवा सीट पर नंदकुमार के सामने बड़ी चुनौती भितरघात की है। पूर्व मंत्री अर्चना चिटनीस विधानसभा चुनाव में अपनी हार के लिए नंदकुमार को अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार मानती हैं। ऐसी ही स्थिति यहां कांग्रेस के अरुण यादव के साथ है।

ये बाधा- पार्टी की अंदरूनी कलह। चिटनीस ने पटरी न बैठना। क्षेत्र में कम सक्रियता। बयानबाजी के विवादों से नकारात्मक छवि बनना। बेटे के कारण विवादों में घिरना।
ये सकारात्मक - प्रतिद्वंद्वी अरुण यादव का उनकी पार्टी में विरोध। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते क्षेत्रीय संगठन का साथ मिलना। मिलनसार हैं। बूथ नेटवर्क बेहतर।

Nandkumar Singh Chauhan
Nandkumar Singh Chauhan IMAGE CREDIT: Nandkumar Singh Chauhan

कोई चुनाव आसान नहीं होता है। दिक्कतें हर जगह होती हैं। हर सीट और हर चुनाव मुश्किल होता है, लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व पर जनता को भरोसा है। इस बार 2014 से भी प्रचंड जीत होगी।
- राकेश सिंह, अध्यक्ष, प्रदेश भाजपा

भाजपा पहले मध्यप्रदेश से गई और अब दिल्ली से जाने की बारी है। जहां तक स्थानीय सीट की बात है तो हर जगह की स्थिति अलग होती है। हमारे यहां कोई अंदरूनी विरोध नहीं है। इस बार कांग्रेस 20 से ज्यादा सीट प्रदेश में लाएगी।
- कांतिलाल भूरिया, सांसद, रतलाम-झाबुआ

Amit Shah
Show More
KRISHNAKANT SHUKLA
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned