पैदल चलते पैर सूज गए तो खरीद ली सेकंड हैंड साइकिल

बोले बड़ी दूर से आए हैं और बड़ी दूर जाना है

- मुंबई से शहडोल,अनूपपुर जा रहे मजदूरों की कहानी

 

By: Arun Tiwari

Published: 10 May 2020, 05:30 PM IST

भोपाल : प्रवासी मजदूर एक ऐसा शब्द है जिसमें दुख,दर्द,संवेदना और परिश्रम सब कुछ है। ये शब्द मानवता के साथ यदि खबर के लिहाज से देखें तो ये आज की सबसे बड़ी खबरों में से एक है। इन दिनों मजदूर खबरों में भी हैं तो सरकारों की जुबान पर भी। सरकार के पास मजदूर कल्याण की ढेरों बातें हैं लेकिन इन भाषणों से ये मजदूर कोसों दूर हैं जो थक-हारकर अपने घर की तरफ बढ़ रहे हैं।

कोरोना के लॉकडाउन ने पलायन करने वाले मजदूरों को घर जाने पर विवश कर दिया है। मजदूरों की घर वापसी उन सरकारी योजनाओं को मुंह चिढ़ा रही है जिसमें पलायन रोकने का दावा किया जाता रहा है। हमने इन मजदूरों के दर्द को इतने करीब से तब देखा जब हमको ये 11 मील के रास्ते पर मिले। कुछ पैदल तो कुछ साइकिल पर जा रहे थे। ये मजदूर मुंबई से अपने घर जाने के लिए निकले थे। कोई शहडोल, अनूपपुर तो कोई रीवा, सतना जा रहा था। सरकार भले ही मजदूरों की वापसी के इंतजाम के लाख दावे करे लेकिन इनकी तकलीफ देखकर वो सारे दावे हवा हो जाते हैं।

साइकिल बनी सहारा :
दोपहर की चिचिलाती धूप में साइकिल पर कुछ युवक होशंगाबाद रोड पर हमारे पास से गुजरे। हमने पूछा कि वे कहां जा रहे हैं तो उन्होंने साइकिल रोककर हमे अपनी कहानी बताई। बब्बू बैगा ने साइकिल के हैंडल पर टंगी प्लास्टिक की बोतल का गर्म पानी दो घंूट गले से गटका और कहा कि लॉकडाउन के कारण परेशान होकर वे घर लौट रहे हैें। उन्होंने कहा कि वे अनूपपुर जिले के जयसिंह नगर जा रहे हैं। बब्बू ने बताया कि वे मुंबई की एक फैक्टरी में काम करते थे। लॉकडाउन हुआ तो वहां से उन्हें निकलने नहीं दिया गया। हमने घर पहुंचने के लिए पूंजी जमा कर रखी थी लेकिन लॉकडाउन में आधे से ज्यादा खत्म हो गई। हम पैदल ही घर की तरफ निकल पड़े। जब पैदल चलना मुश्किल हुआ तो जो जमापूंजी थी उससे सेकंड हैंड साइकिल खरीद ली। कभी धक्का लगाकर तो कभी पैडल मारकर इस साइकिल के सहारे ही अपने घर पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। बब्बू के साथी मिथलेश ने कहा कि वे सभी किराए के मकान में रहते हैं, लॉकडाउन में फैक्टरी में काम बंद हो गया, उस दिन से मालिक ने कुछ दिन इन्हें राशन दिया फिर जाने को कह दिया। घर पर पहुंचाने के लिए जो रुपए जोड़कर रखे थे, उसमें से ज्यादा तो खर्च हो गए। करीब 150 किलोमीटर पैदल सफर किया जब पैरों में छाले पड़ गए तो टूटी फूटी साइकिल ही एक सहारा नजर आई। थक जाते हैं तो पेड़ के नीचे सो जाते हैं और फिर धूप कम होते ही सफर पर निकल पड़ते हैं।

पैर अब चलने लायक भी नहीं रहे :
इन साइकिल सवारों को रवाना कर हम थोड़ी दूर पर एक पेड़ के नीचे बैठी रामबाई को देखकर रुक जाते हैं। रामबाई की गोद में बच्चा है तो पैरों में छाले। ये लोग भी मुंबई से निकले हैं और सतना जा रहे हैं। रामबाई कहती हैं कि गरीबी जो न कराए वो कम है। हम अपने पूरे परिवार के साथ मुंबई में मजदूरी कर अपना पेट पालते हैं। पिछले दस दिनों से लगातार पैदल चल रहे हैं। अब तो पैर भी जवाब देने लगे हैं। कभी कहीं खाना मिल जाता है तो कभी पानी पीकर ही काम चला लेते हैं। उनके साथ चल रही गुड्डी बाई ने कहा कि सुना तो हमने भी है कि सरकार रेल और बस से लोगों को ला रही है लेकिन कौन ला रहा है, कहां से ला रहा है ये उनको नहीं मालूम। कभी कुछ लोग मिल जाते हैं तो पूड़ी के पैकेट पकड़ा देते हैं। गुड्डी बाई ने कहा कि वे कभी बाहर मजदूरी करने न जाएं लेकिन यहां रोजगार तो मिले। हम इनकी कहानी को यहीं छोड़ वापस भोपाल की तरफ लौटते हैं तो कुछ और मजदूर मुंह पर मास्क लगाए हुए पैदल चलते नजर आते हैं। हम ये सोचते हुए वापस लौट आते हैं कि गरीबों को भगवान मानने वाली सरकारों की व्यवस्थाएं आखिर हो किसलिए रही हैं जब इनको इसका फायदा ही नहीं मिल रहा।

Corona virus
Arun Tiwari Reporting
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