बनते बिगड़ते समीकरणों के बीच भाजपा के किलों पर खतरे का साया!

बनते बिगड़ते समीकरणों के बीच भाजपा के किलों पर खतरे का साया!

Deepesh Tiwari | Publish: Apr, 22 2019 01:05:29 PM (IST) | Updated: Apr, 22 2019 01:05:30 PM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

भाजपा की इस रणनीति में उलझ गए...

भोपाल। मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनावों 2019 की शुरुआत होने वाली है। इसी को देखते हुए सभी दलों ने तकरीबन हर सीट पर अपने उम्मीदवार भी घोषित कर दिए हैं। इसके चलते जहां हर पार्टी ने अपनी रणनीति के तहत कार्य करना शुरू कर दिया है, वहीं मध्यप्रदेश में भाजपा के किलों पर नए चेहरों की रणनीति को लेकर कई जानकार तक असमंजस्य की स्थिति में हैं।

ऐसे में माना जा रहा है कि मध्यप्रदेश में भाजपा को लेकर लगातार बनते बिगड़ते समीकरणों के बीच भाजपा ने नाराज हो रहे अपने ही लोगों को मनाने के लिए ये खास रणनीति बनाई है, ताकि किलों को सुरक्षित रखा जा सके।

दरअसल मध्यप्रदेश में भाजपा के प्रमुख चार किले हैं, जहां पार्टी पिछले कई दशकों से कब्जा जमाए बैठी है, लेकिन इस बार अचानक इन सभी सीटों पर नए प्रत्याशी खड़े कर दिए गए हैं। जिनके चलते आम जनता से लेकर जानकार तक भाजपा की इस रणनीति में उलझ से गए हैं।

election 2019

एक ओर जहां भोपाल जैसी वीआइपी सीट से भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को अपना प्रत्याशी दिग्विजय सिंह जैसे कद्दावर नेता के सामने बनाया है।

वहीं दूसरी ओर विदिशा जैसी खास सीट से इस बार भाजपा ने रमाकांत भार्गव को और इंदौर जैसे मजबूत सीट से शंकर लालवानी को अपना उम्मीदवार बनाया है। इन तीनों ही सीटों को लेकर लंबी रसाकशी के बाद इन उम्मीदवारों के नाम घोषित किए गए।

ऐसे में जहां कुछ जानकार इन्हें भाजपा के कमजोर उम्मीदवार मान कर भाजपा के इन किलों को खतरे में बता रहे हैं। वहीं अधिकांश जानकार कमजोर उम्मीदवार की बात को सिरे से खारिज करते हुए, इसे भाजपा की रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं।

उनका कहना है कि अपने नेताओं को कांग्रेस के जाल में फंसने से बचाने के लिए और अपने प्रचार तंत्र को मजबूत रखने के साथ ही कांग्रेस के नेताओं को ही इन किलों की लड़ाई में घेरने के लिए इस रणनीति का इस्तेमाल किया गया है।

वहीं कुछ जानकार तो यहां तक कह रहे हैं कि भाजपा चुनाव के बाद अपने उन चंद बड़े नेताओं को जिन्हें चुनाव में नहीं उतारा गया है, उन्हें राज्यसभा के रास्ते संसद में वापस ला सकती है।

राजनीति के जानकार डीके शर्मा के अनुसार लगातार बदल रहे बनते बिगड़ते समीकरणों के बीच भाजपा का इन प्रत्याशियों पर दांव थोड़ा चौंकाने वाला जरूर है। लेकिन कमजोर कतई नहीं दिख रहा है। उनके अनुसार दरअसल ये भाजपा की खास सीटें हैं, जहां भाजपा कई दशकों से जमी हुई है।

ऐसे में शायद भाजपा को इन सीटों पर जीत की पूरी आशा है, इसी कारण वह अपने बड़े नेताओं को इन सीटों पर फंसाने की बजाय चुनाव प्रचार में पूरी तरह से झोंकने के प्लान के तहत काम करती दिख रही है।

उनके अनुसार दरअसल ऐसी कुछ सीटें भी हैं जहां किसी खास उम्मीदवार को लेकर भितरघात का संदेह भी था, ऐसे में नए चेहरे लाकर भाजपा ने उस भितरघात पर भी लगाम लागने की कोशिश की है।

जानिये अपने उम्मीदवार को...


1. भोपाल सीट : साध्वी प्रज्ञा ठाकुर -
साध्वी प्रज्ञा ठाकुर मध्य प्रदेश के एक मध्यमवर्गीय परिवार से आती हैं। परिवारिक पृष्ठभूमि के चलते वे संघ व विहिप से जुड़ी और फिर बाद में संन्यास धारण कर लिया। वह मालेगांव विस्फोट कांड की वजह से सुर्खियों में आईं।

क्या आप जानते हैं साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के बारे में ये सब...
मध्य प्रदेश के भिंड जिले कछवाहा गांव में जन्मी साध्वी प्रज्ञा के पिता आरएसएस के स्वयंसेवक व आयुर्वेदिक चिकित्सक थे।

-48 वर्षीय साध्वी आरएसएस व एबीवीपी की सक्रिय सदस्य रही हैं। विश्व हिंदू परिषद की महिला विंग दुर्गा वाहिनी से भी जुड़ी रही।

-2002 में 'जय वंदे मातरम जन कल्याण समिति' का गठन किया। स्वामी अवधेशानंद से प्रभावित होकर संन्यास लिया।

-मालेगांव ब्लास्ट में नाम आने से उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। कोर्ट ने उन पर लगे मकोका एक्ट को कुछ समय बाद हटा लिया था। उन पर गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला चला।

-2017 में उनको बड़ी राहत तब मिली, जब देवास कोर्ट ने आरएसएस प्रचारक सुनील जोशी हत्याकांड से उन्हें बरी कर दिया।

-साध्वी को प्रयागराज कुंभ के दौरान 'भारत भक्ति अखाड़े' का आचार्य महामंडलेश्वर घोषित किया गया था। प्रज्ञा ठाकुर अब आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी पूर्णचेतनानंद गिरि के नाम से जानी जाती हैं।

2. विदिशा प्रत्याशी: रमाकांत भार्गव -
विदिशा लोकसभा सीट देश की हाईप्रोफाइल सीटों में से एक है। ये बीजेपी की सबसे सुरक्षित सीटों में से एक मानी जाती है। यहां से राज्य के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी सांसद रह चुके हैं।

शुरू में यहां से चर्चा तो शिवराज सिंह चौहान की पत्नी साधना सिंह की भी थी, लेकिन आखिर में टिकट रमाकांत को मिला। वैसे रमाकांत को शिवराज सिंह का करीबी माना जाता है।

 


3. इंदौर सीट : शंकर लालवानी -
साल 1993 में विधानसभा क्षेत्र-4 से लालवानी को भाजपा अध्यक्ष का कार्यभार मिला। इसके तीन साल बाद 1996 में हुए नगर निगम चुनाव में उन्हें जयरामपुर वार्ड से टिकट मिला था। इसमें उन्होंने अपने भाई और कांग्रेस प्रत्याशी प्रकाश लालवानी को हराया और पार्षद बने।

वहीं डॉ. उमाशशि शर्मा के महापौर (मेयर) कार्यकाल में लालवानी ने सभापति जैसे महत्वपूर्ण पद का कार्यभार संभाला। वह तीन बार पार्षद रहे लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया।

हालांकि, कुछ समय बाद पार्टी ने उन्हें नगर अध्यक्ष बना दिया। नगर अध्यक्ष के पद पर रहते हुए ही उन्हें इंदौर नगर निगम प्राधिकरण की जिम्मेदारी दी गई थी। इंदौर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे लालवानी का मुकाबला कांग्रेस के पंकज संघवी से होना है।

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