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कॉम्पीटिशन का तनाव भी है बीमारी, इलाज कराएं और पाएं सफलता

भाई ने क्रेक की सिविल सर्विसेज, बहन ने नीटी पीजी एग्जाम में पाई सफलता

भोपाल

Published: June 18, 2022 12:59:39 am

भोपाल। बढ़ते कॉम्पीटिशन नेे युवाओं में तनाव बढ़ा दिया है, वे कई सालों तक ये समझ ही नहीं पाते कि वे मेंटल हेल्थ प्रॉब्लम फेस कर रहे हैं। शहर के एक भाई-बहन ने इस परेशानी को समझा और एंग्जाइटी इलाज के बाद भाई ने जहां सिविल सर्विसेज में सफलता पाई तो बहन ने नीट पीजी क्लियर की। उनकी कहानी इसलिए जरूरी है क्यूंकि एक सर्वे के अनुसार देश के शहरों में 15.20 प्रतिशत लोग एंग्जाइटी और 15.17 प्रतिशत लोग डिप्रेशन के शिकार हैं। 50 प्रतिशत लोग अपनी नींद भी पूरी नहीं कर पा रहे। यदि युवाओं को बीमारी का पता चल भी जाता है तो वे समाज और परिवार के डर से इलाज कराने की बजाए इससे जूझते रहते हैं।

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चार साल तक मैं इसे समझ ही नहीं पाई, फिर भाई की मदद भी की
श्रेया(परिवर्तित नाम) ने बताया कि 2017 में मैंने एमबीबीएस में एडमिशन लिया। सेकंड ईयर में परेशानी हुई लेकिन मैं समझ नहीं पाई कि मुझे एंग्जायटी डिसऑर्डर है। 2021 में जब नीट पीजी की तैयारी करने लगी तो मुझे नींद आना बंद हो गई। मैं अचानक रोने लगती, लगातार कुछ ख्याल दिमाग में आते रहते, मेरी प्रोडक्टिविटी कम होने लगी। मैंने डॉक्टर से कंसल्ट किया तो मुझे इसका पता चला। कुछ दिनों बाद पता चला कि सिविल सविर्सिज की तैयारी कर रहे मेरे छोटे भाई अमित(परिवर्तित नाम) को भी ये समस्या है। पहले मैंने और फिर भाई ने इलाज कराया। ठीक होने पर मैंने नीट पीजी परीक्षा पास की। अब मैं एमडी एनेस्थीसिया की पढ़ाई की तैयारी कर रही हूं। वहीं, भाई ने उसका एग्जाम क्रेक कर लिया। उसे आईआरएस कैडर मिलने की संभावना है।

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क्या होते हैं एंग्जायटी के लक्षण
कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी ने बताया कि एंग्जायटी के मुख्य लक्षण घबराहट, बेचैनी, अनिंद्रा, आशंका, इंटरव्यू में ब्लैंक हो जाना, हाथ थरथराना, दिल की धड़कन बढऩे लगना, मुंह सूखने लगना, ङ्क्षचताओं से घिरे रहना और अपच है। वहीं, अन्य कारणों में अनुवांशिक, कठिन बचपन, तुलना, स्कूल में बुली और ब्रेन में न्यूरोट्रांसमीटर डिसबैलेंस है। यह केस एक आदर्श उदाहरण है कि कैसे एक साइकियाट्रिक डिसऑर्डर आपकी उत्पादकता को कम कर सकता है। यह सबसे ज्यादा देखा जाने वाला साइकियाट्रिक डिसऑर्डर है। रोजाना ओपीडी में लगभग 60 प्रतिशत केसेस एंग्जायटी से जुड़े होते हैं। जागरुकता के अभाव और समाज में बदनामी के डर के चलते युवा इलाज से घबराते हैं। डॉ. त्रिवेदी के अनुसार अपनों से संवाद करें। स्वयं से कोई दवा का सेवन न करें। लक्षणों को स्वीकार करें। दिनचर्या को नियमित रखें। मनोचिकित्सक से मिलने में संकोच न करें। परिवार को परेशानी के बारे में बताएं।

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