भाजपा के गढ़ में कांग्रेस ने लगाई सेंध, चुनावी मोर्चे पर दो मंत्री

भाजपा के गढ़ में कांग्रेस ने लगाई सेंध, चुनावी मोर्चे पर दो मंत्री

Anil Chaudhary | Publish: Jan, 12 2019 05:27:24 AM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

भोपाल : आसान नहीं आलोक की राह, चेहरा के भी आसार

- ऐसा है वोटों का गणित
चुनाव वर्ष भाजपा कांग्रेस
2013 विधानसभा 670956(6 सीट) 413185 (1 सीट)
2014 लोकसभा 714178 343482
2018 विधानसभा 657532(5 सीट) 594075 (3 सीट)
भोपाल. भाजपा के गढ़ भोपाल संसदीय सीट में इस बार समीकरण बदल गए हैं। मोदी लहर में 3.70 लाख से अधिक वोटों से जीत का अंतर हाल के विधानसभा चुनाव में महज 63 हजार में सिमट गया है। कांग्रेस को केवल भोपाल उत्तर की सीट तक घेरकर रखने वाली भाजपा को मध्य और दक्षिण-पश्चिम जैसी परंपरागत सीट में झटका लगा है। मंत्री बने उमाशंकर गुप्ता हार गए। वोटों के बिगड़े गणित ने भाजपा और सांसद आलोक संजर की चिंता को बढ़ा दिया है। कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को घेरने के लिए भोपाल शहर से दो मंत्री बनाए हैं। जिन पर विधानसभा से बेहतर परिणाम लाने की जिम्मेदारी होगी।
भाजपा के कार्यालय मंत्री से सांसद बने आलोक साढ़े चार साल में संगठन और सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहे। स्थानीय समस्याओं और मुद्दों को हल कराने में सरकारी महकमों में कमजोर पकड़ रही। भाजपा ने पिछले आम चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी कैलाश मिश्रा को सक्रियता की कमी की वजह से आसानी से हरा दिया था, लेकिन इस बार भाजपा को कांग्रेस से मजबूत चुनौती मिल रही है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने शहर की सात में से तीन सीटें जीत ली हैं। लोकसभा चुनाव पर विस चुनाव में मिली शिकस्त का असर भी रहेगा, इसकी वजह केंद्र सरकार से बढ़ी नाउम्मीदी है।
- चेहरे बदलती रही है भाजपा
भोपाल सीट भाजपा के लिए सबसे सुरक्षित मानी जाती है। यही वजह है कि वह चेहरे बदलकर जीत हासिल करती रही है। सुशीलचंद्र वर्मा की रिकॉर्ड जीत के बाद पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी, उमा भारती भी यहां से उतर चुके हैं। आलोक को पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के आखिरी समय में उतारा था। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की ग्वालियर सीट के समीकरण बिगड़े हैं और वे इस बार भोपाल से लडऩे का मन बना रहे हैं। 2019 के चुनाव में नहीं उतरने की बात कह चुकी उमा भारती भी भोपाल से उतर सकती हैं।
- सदन में खूब बोले, उपलब्धि नहीं मिली
आलोक लोकसभा में खासे सक्रिय रहे। 389 प्रश्न पूछे और 117 डिबेट में हिस्सा लिया, लेकिन सदन की उनकी मुखरता भोपाल के काम नहीं आ सकी। देश की सबसे तेज चलने वाली टे्रन 18 पहले भोपाल से ही शुरू होनी थी। ऐनवक्त पर रेलवे ने इसे बदल दिया। इसके लिए सांसद ने कुछ खास प्रयास नहीं किया। लोकसभा में संसदीय सत्रों के दौरान आलोक की भूमिका वोटिंग और मोदी सरकार के प्रस्तावों पर समर्थन देने तक ज्यादा सीमित रही। भोपाल का एक भी ऐसा मुद्दा लोकसभा में नहीं उठा, जिससे जनहित जुड़ा हो। सांसद ने ट्रेन कनेक्टिविटी का प्रस्ताव जरूर लोकसभा से मंजूर करवाया था, जिसके बाद शताब्दी का स्टॉपेज हबीबगंज रेलवे स्टेशन तक हुआ था। भोपाल के खाते में कोई बड़ी उपलब्धि नहीं आई है।

- किए थे ये वादे
मास्टर प्लान- सांसद संजर अपने पूरे कार्यकाल के दौरान मास्टर प्लान को लेकर औपचारिकताएं पूरी नहीं करवा पाए। उन्होंने कभी इस मामले में संबंधित विभागों से चर्चा तक नहीं की।
एयर कनेक्टिविटी- भोपाल से देश के दूसरे हिस्सों तक एयर कनेक्टिविटी बढ़ाने के मुद्दे पर भी सांसद वादे के मुताबिक फ्लाइट्स की संख्या में इजाफा नहीं कर सके। कमलनाथ सरकार के आने के बाद इंडिगो और स्पाइस जेट ने अपनी फ्लाइट बढ़ाई हैं।
इंडस्ट्रियल एरिया- भोपाल राजधानी होने के बावजूद औद्योगिक गतिविधियों में पिछड़ा हुआ है। सांसद पूरे कार्यकाल में गोविंदपुरा, सीहोर और आसपास के इलाकों में इस प्रकार की कोई नई गतिविधि शुरू नहीं करवा सके।
- सांसद निधि का इस्तेमाल
सांसद निधि के 25 करोड़ रुपए में से लगभग 75 प्रतिशत ही खर्च किए हैं। सांसद निधि से स्वीकृत कार्यों का फंड कलेक्टर स्तर से जारी किया गया जबकि स्वेच्छानुदान स्वयं सांसद ने लोगों को दिया। इस पर भी कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं शुरू करा पाए।

सांसद के तौर पर आलोक संजर जनता के बीच पहुंचते रहे, लेकिन विकास के मुद्दे पर उनका उल्लेखनीय योगदान नहीं रहा।
- अमित श्रीवास्तव, व्यापारी

एजुकेशन के क्षेत्र में आज भी भोपाल के विद्यार्थियों को बड़े शहर जाना पड़ता है। सामान्य डिग्री कोर्स के अलावा यहां कोई विशेष कोर्स का संचालन कब शुरू होगा इसका जवाब हमें नहीं मिलता।
- विनय शाक्य, विद्यार्थी

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