कांग्रेस के नेता पुत्र जमे, भाजपा में पिता ने लड़ा चुनाव तो बेटे टिकट को तरसे

दली राजनीति में मुश्किल हुई परिजनों की स्वीकार्यता
वंशवाद की बेल में कहीं खिले तो कहीं मुरझाए फूल

By: anil chaudhary

Published: 29 Mar 2019, 05:21 AM IST

अरुण तिवारी, भोपाल. देश के राजनीतिक दलों में वंशवाद की बेल बहुत पुरानी है। कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार का सिक्का आज भी चल रहा है। समाजवादी पार्टी में यादववाद आ गया है। इस मर्ज से अब भाजपा भी ग्रसित हो गई है। प्रदेश की सियासी तस्वीर भी कुछ इसी तरह रही है, लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं। समाज में नेताओं के परिजनों की स्वीकार्यता कम होने लगी है। इसे भांपते हुए राजनीतिक दल पिता या पुत्र में से किसी एक को चुन रहे हैं। जिन नेता ने अपने पद की कुर्बानी दी उसके पुत्र को मौका मिल गया। जो नेता कुर्सी से चिपके रहे, उनके पुत्र टिकट को तरसते रहे। अब उनकी किस्मत में पांच साल का इंतजार और आ गया है।
- पिता ने लड़ा चुनाव तो पुत्रों को नहीं मिला मौका
भाजपा के कई नेता अपने पुत्रों और परिजनों को विधायक-सांसद बनाना चाहते हैं। पार्टी ने अघोषित शर्त भी रख दी कि दो में से कोई एक चुनाव लड़ सकता है। पिता ने कुर्सी नहीं त्यागी तो बेटे की किस्मत में इंतजार और बढ़ गया। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव के बेटे अभिषेक भार्गव को न विधानसभा चुनाव का टिकट मिला, न लोकसभा का। इतना ही नहीं जयंत मलैया के बेटे सिद्धार्थ मलैया, गौरीशंकर बिसेन की पुत्री मौसम, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के बेटे मंदार महाजन, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के बेटे देवेंद्र तोमर, सांसद प्रभात झा के पुत्र तुष्मुल झा और नरोत्तम मिश्रा के पुत्र सुकर्ण में से किसी को भी टिकट नहीं मिला।

- भाजपा में इनको मिला मौका
गौरीशंकर शेजवार ने चुनाव लडऩे का मना किया तो पार्टी ने पुत्र मुदित शेजवार को उनकी सीट से टिकट दे दिया गया, हालांकि वे चुनाव हार गए। सांसद लक्ष्मीनारायण यादव के बेटे सुधीर यादव को सुरखी और पूर्व विधायक मेहरबान सिंह रावत की बहू सरला रावत को सबलगढ़ से टिकट मिला, लेकिन दोनों चुनाव हार गए। कैलाश विजयवर्गीय ने चुनाव नहीं लड़ा तो उनके पुत्र आकाश विजयवर्गीय को विधानसभा का टिकट मिला और वे विधायक बन भी गए।
- एक दशक पहले स्थापित भाजपा नेताओं के पुत्र
पहले नेता पुत्रों का राजनीति में प्रवेश आसानी से हो जाता था। भाजपा में भी नेता पुत्रों की कतार है, जो तीन-तीन बार से विधायक बन रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के भतीजे सुरेंद्र पटवा, पूर्व सांसद कैलाश सारंग के पुत्र विश्वास सारंग, पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सकलेचा के पुत्र ओमप्रकाश सकलेचा और पूर्व सांसद लक्ष्मीनारायण पांडे के पुत्र राजेंद्र पांडे भाजपा के सीनियर विधायकों में शुमार हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के पुत्र दीपक जोशी भी पिछली सरकार में मंत्री थे। हालांकि, इस बार वे अपना चौथा विधानसभा चुनाव हार गए।
- इनको अपनी बारी का इंतजार
कांग्रेस में भी ये फेहरिस्त लंबी है, जिनको अपनी बारी का इंतजार है। सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की पत्नी प्रियदर्शनीराजे सिंधिया को ग्वालियर से मौका मिलने की चर्चा तेज है। मंत्री तुलसी सिलावट अपने बेटे बंकिम को उज्जैन से विधायक बनाना चाहते हैं। मंत्री सज्जन सिंह वर्मा के पुत्र पवन देवास, जीतू पटवारी की पत्नी रेणुका इंदौर और बाला बच्चन की पत्नी प्रविणा खरगौन सीट से टिकट की दावेदार हैं। जबकि , इनके पति और पिता पहले से राजनीति की चुनावी भूमिका में हैं।
- ये हो चुके हैं स्थापित
कांग्रेस में कई नेता पुत्र पांच साल पहले राजनीति में स्थापित हो चुके हैं। दिग्विजय सिंह के बेटे जयवद्र्धन सिंह मंत्री हैं। दिग्विजय खुद राज्यसभा सदस्य हैं और उनके भाई लक्ष्मण सिंह विधायक हैं। सुभाष यादव के पुत्र सचिन यादव, इंद्रजीत पटेल के पुत्र कमलेश्वर पटेल भी मंत्री हैं। पूर्व मंत्री हरवंश सिंह के बेटे रजनीश सिंह को दूसरी बार मौका मिला, लेकिन वे चुनाव हार गए। मुख्यमंत्री कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ पिता के सीएम बनने के बाद उनकी सीट पर सांसद का चुनाव लडऩे जा रहे हैं।

कांग्रेस योग्य कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाती है। पार्टी में सभी एक समान हैं। जो पार्टी वंशवाद का आरोप लगाती है, उसी में सबसे ज्यादा वंशवाद है और कार्यकर्ताओं की फिक्र नहीं।
- ज्योतिरादित्य सिंधिया, महासचिव, कांग्रेस

नेता पुत्र होना न टिकट मिलने का आधार होना चाहिए और न ही किसी का टिकट काटने का। कोई नेता का परिजन पार्टी में लंबे समय से काम करता है और योग्य है तो टिकट के बारे में सोचा जाना चाहिए।
- गोपाल भार्गव, नेता प्रतिपक्ष

anil chaudhary
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