हुनर हो तो ऐसा! कमजोरी को बनाया हथियार और जीतते चले गए...

शहर की तीन प्रतिभाओं ने शारीरिक रूप से कमजोर होने के बावजूद बनाई अपनी पहचान

(यह सभी तस्वीरें उन खिलाडिय़ों की हैं जिन्होंने शारीरिक अक्षमता को दरकिनार करते हुए अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।)

मुकेश विश्वकर्मा
भोपाल। मंजिलें उन्हीं को मिलती है, जिनके कदमों में जान होती है। पंखों से कुछ नहीं होता, हौंसलों से उड़ाने होती हैं। इसे चरितार्थ किया है शहर के तीन खिलाडि़यों ने जो शारीरिक रूप से कमजोर (स्पेशल कैटेगिरी) है, लेकिन मन की ऊंची उड़ान से देश-दुनिया में नाम कमा रहे हैं। इसमें स्टार गोलकीपर अब्दुल समद जहां बोल-सुन न पाने की कमजोरी के बावजूद नेशनल चैम्पियनशिप में बेस्ट गोलकीपर का अवॉर्ड पा चुके हैं। वहीं, इसी कमजोरी के साथ नन्ही सी गौरांशी ने सिर्फ इशारों में बैडमिंटन को सीख सफलता की कहानी को भी सीख लिया है। इसके अलावा 16 साल की साइक्लिस्ट डॉली पालीवाल ने अपनी मानसिक कमजोरियों को पीछे छोड़ते हुए स्पेशल ओलंपिक में कई पदक अपने नाम किए। मुश्किल परिस्थितियों से निकलकर सफलता की इन तीन कहानियों को पत्रिका पेश कर रहा है।  


अब्दुल समद का कोई सानी नहीं
हॉकी का प्यार समद ने पिता से बचपन में सीखा और प्रशिक्षण शुरू कर दिया। हॉकी की किसी भी प्लेस पर खेलने में सक्षम समद यूं तो फॉरवर्ड प्लेयर था लेकिन न बोल और सुन पाने के कारण वह गोलकीपर बन गया। समज ने यहां भी हार न मानते हुए अपनी प्रतिभा का लोहा देश-विदेश मे हुईं विभिन्न हॉकी चैम्पियनशिप में मनवाया। 25 साल के अब्दुल समद ने हॉकी इंडिया के पांच सीनियर नेशनल हॉकी चैंपियनशिप में अपनी प्रतिभा से सभी को चौंकाया। इस दौरान कई बार बेस्ट गोलकीपर के अवार्ड से नवाजा भी गया। उन्हे 2012 में गॉडफ्राय फिलिप्स ब्रेवरी अवार्ड (माइंड ऑफ स्टील अवार्ड) से सम्मानित किया जा चुका है। वे भोपाल हॉकी, साई भोपाल और मप्र राज्य हॉकी अकादमी में भी बेस्ट गोलकीपर हैं। 


बैडमिंटन स्टार बनना है सपना 
शहर की नन्हीं बैडमिंटन खिलाड़ी गौरांशी शर्मा सुनने और बोलने में अक्षम होने के बावजूद 8 साल की छोटी से उम्र में ही इशारों से ही बैडमिंटन खेलना सीखा। ये बात हैरत कर देने वाली तो है लेकिन सच है। सिर्फ गौरांशी ही नहीं बल्कि उसके माता पिता, प्रीति और गौरव शर्मा भी बोल और सुन नहीं सकते। यह उन लोगों के लिए प्रेरणा से कम नहीं जो अपनी कमजोरियों का बहाना रोते हैं। गौरांशी ने अब तक एक साल के छोटे से करियर में डिस्ट्रिक्ट में उपविजेता और मंदसौर में संपन्न स्टेट ओपन बैंडमिंटन चैंपियनशिप में अपने खेल का जौहर दिखा चुकी हैं। गौरांशी भविष्य में बैडमिंटन स्टार बनना चाहती हैं।


स्पेशल ओलंपिक की स्टार बनी डॉली
लॉस एंजिलिस में स्पेशल ओलंपिक में दो पदक जीत चुकीं डॉली जहां एक मानसिक रूप से कमजोर हैं। वहीं उनके माता-पिता भी नहीं हैं।  एसओएस बालग्राम में रहने वाली  डॉली को साइक्लिंग के लिए जब  प्रोत्साहित किया गया तो एक अनोखा टैलेंट सामने आया जो कि आज उन्हें नई पहचान दे रहा है। डॉली ने अपनी प्रतिभा के बल पर लांस एंजलिस में पांच किमी की साइकिल रेस में कांस्य और 10 किमी रेस में रजत पदक जीता है। यहीं नहीं डॉली ने डिस्ट्रिक्ट टूर्नामेंट में गोल्ड, स्टेट में गोल्ड, नैशनल चैंपियशिप में गोल्ड जीता है।  
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Brajendra Sarvariya
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