scriptCultivate palmrose grass like this, good profit at low cost in MP | पामरोज घास की ऐसे करें खेती, एमपी में कम लागत में अच्छा मुनाफा | Patrika News

पामरोज घास की ऐसे करें खेती, एमपी में कम लागत में अच्छा मुनाफा

खेती में सिंचाई की जरूरत और बढ़ती लागत किसानों के लिए सबसे बड़ी समस्या है। लेकिन जरा सी जागरूकता और ज्ञान से आप कम लगत और पानी में भी अच्छी कमाई कर सकते हैं।

भोपाल

Published: May 29, 2022 05:29:01 pm

भोपाल. खेती में सिंचाई की जरूरत और बढ़ती लागत किसानों के लिए सबसे बड़ी समस्या है। लेकिन जरा सी जागरूकता और ज्ञान से आप कम लगत और पानी में भी अच्छी कमाई कर सकते हैं। गुजरात के सूरत जिले के किसान महेंद्र कापडिय़ा घास उगाकर कर कम सिंचाई और कम लागत में अच्छी पैदावार कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में इसकी खेती कम लागत और कम पानी में की जा सकती है।

पामरोज घास की ऐसे करें खेती, एमपी में कम लागत में अच्छा मुनाफा
पामरोज घास की ऐसे करें खेती, एमपी में कम लागत में अच्छा मुनाफा

क्या है कापडि़य़ा यानि पामरोजा घास?
पामरोजा भी सुगंधित पौधा है। इसकी खुशबू गुलाब जैसी होती है। इत्र, गुलाब जल व साबुन आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। इसकी बुआई, छंटाई व कटाई का काम पारंपरिक खेती जैसे करना होता है। बुआई के समय नमी होना जरूरी होता है। रोपाई के समय खेत पर मामूली पानी भरा होना चाहिए। मगर अधिक पानी होने पर फसल के को खतरा हो सकता है। कृषि विशेषज्ञ के अनुसार कृषि विभाग द्वारा आयोजित शिविरों में किसानों को इसकी जानकारी दी जाती है। औषधीय खेती करके किसान प्रति बीघा अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं। किसानों को विभाग द्वारा इसकी संपूर्ण जानकारी भी दी जाती है।

कहां, कैसे और कब लगाए पामरोजा घास?

कम वर्षा वाले क्षेत्रों एवं ढालू जमीनों में यह असिंचित फसल के रूप में उगाई जा सकती है। मिट्टी पीएच 9.0 तक में इसकी खेती की जा सकती है। पामरोजा घास की खेती कई तरह के क्षेत्र में सम्भव है। रोपाई के समय खेत में खरपतवार होना चाहिए। जड़दार कलमों (स्लिप्स) को लगभग 60 गुना 30 या 60 गुना 45 सेमी की दूरी पर मिट्टी में अच्छी तरह दबाकर लगाना चाहिए। मैदानी एवं सामान तापमान वाले भागों में इसकी रोपाई जुलाई-अगस्तमें की जाती है। सिंचाई की सुविधा वाले क्षेत्रों में फरवरी एवं मार्च में भी रोपाई की जा सकती है। फरवरी-मार्च में लगाई गई फसल की पैदावार पहले साल 30 प्रतिशत ज्यादा होती है।

पामरोजा घास की लगत और कमाई
पामरोजा घास की खेती करने वाले किसान मनीष दुबे ने बताया कि दो साल से ऑयल तैयार होने वाले चारे की खेती शुरू की है। 20 एकड़ में 4 हजार रुपये प्रति एकड़ की लागत लगाई है। अब पांच साल तक 10 से 12 लाख रुपय प्रति साल मुनाफा आएगा।

एक बीघा जमीन में पामरोजा घास की एक टन से ज्यादा पैदावार
किसान महेंद्र के मुताबिक एक बीघा जमीन में "पामरोजा" यानि कापडिय़ा घास की एक टन से ज्यादा पैदावार हो जाती है। सालभर में पांच बार यह पैदावार ली जा सकती है। खेत में पामरोजा घास बोने के बाद यह सात साल तक मामूली पानी की सिंचाई से उगती रहती है। एक टन पामरोजा घास से औसतन 8 लीटर तेल प्राप्त होता है। इसकी बाजार कीमत प्रति लीटर 2,500 रुपए से भी ज्यादा रहती है। बॉयलर-प्रोसेसर्स मशीन 50 प्रतिशत सब्सिडी पर उपलब्ध हो जाती है।

खराब मौसम ओर जानवरों से भी सुरक्षित है फसल
इस फसल पर तूफान व सूखे जैसे हालत में भी नुकसान की कम आशंका होती है। इसके साथ ही अन्य फसलों को नीलगाय, छुट्टा जानवर खाकर खत्म कर देते हैं, लेकिन खुशबू वाली फसलों का जानवर नहीं छूते हैं। इससे फसलें सुरक्षित रहती हैै।


80 बीघा खेत में केवल उगाई पामरोजा घास
लखनऊ (यूपी) के कृषि प्रयोग और अन्वेषण केंद्र में करीब तीन माह की ट्रेनिंग लेकर लौटे युवा किसान महेंद्र ने दिणोद गांव में अपने 80 बीघा खेत में केवल पामरोजा घास के बीज बोए। देखते ही देखते यह घास पूरे खेत में फैल गई और तीन महीने में तैयार भी हो गई। इसके बाद महेंद्र ने लखनऊ के कृषि प्रयोग व अन्वेषण केंद्र से मंगाए बॉयलर और प्रोसेसर्स मशीन से घास से तेल निकालने का प्रयोग भी शुरू कर दिया। वे बताते हैं कि यह कम लागत और कम सिंचाई की खेती है। इससे मुनाफा भी अच्छा होता है।

पामरोजा घास की एक बार बुबाई करने के बाद कम पानी से तैयार कर लिया जाता है। इसके अलावा तेल निकलने के बाद बचा कचरा भी ईंधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इस तेल का सर्वाधिक उपयोग कॉस्मेटिक उत्पाद कम्पनियां करती हैं। इस तेल की खुशबू गुलाब के सामान्य होती है, इसलिए इससे शैम्पू, परफ्यूम, समेत कई चीजें बनाई जाती हैं। सबसे अछि बात यह है इस फसल की, इससे निकलने वाले तेल को कंपनियां खुद खरीद कर ले जाती है बस उन तक जानकारी पहुँचाने का काम किसान को करना होता है।

मध्य प्रदेश की आधे से भी कम भूमि कृषि योग्य
मध्य प्रदेश की आधे से भी कम भूमि कृषि योग्य है। एमपी की स्थलाकृति (सतह के प्रकार), साल में होने वाली वर्षा और मिट्टी में भिन्नता के कारण इसका वितरण काफी असमान है। मुख्य खेती वाले क्षेत्र मालवा और रीवा में पाए जाते हैं। इसके अलावा नर्मदा घाटी एक अन्य उपजाऊ क्षेत्र है। राज्य की कृषि भारी वर्षा पर निर्भर रही है। कुछ क्षेत्र अक्सर सूखे से पीडि़त होते हैं। मध्य प्रदेश में सिंचाई मुख्य रूप से नहरों, कुओं और तालाबों के माध्यम से की जाती है। ऐसे में यहां पामरोजा जैसी फसल जो कम सिंचाई की खेती है एक अच्छा उपाय साबित हो सकती हैं।

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