भोपाल को दो नगर निगम में बांटा तो कैसे होगा पानी, सीवेज और सड़क का बंटवारा

भोपाल को दो नगर निगम में बांटा तो कैसे होगा पानी, सीवेज और सड़क का बंटवारा
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Yogendra Kumar Sen | Updated: 12 Oct 2019, 10:40:39 PM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

नगर निगम का बंटवारा: नर्मदा का सम्पवैल कोलार में तो कोलार का भोपाल नगर निगम में, जलापूर्ति सिस्टम बांटना मुश्किल, 23 टंकियां दोनों को कैसे मुहैया कराएंगी पानी

भोपाल. राजधानी को दो नगर निगमों में बांटने की कवायद के बीच जलापूर्ति सिस्टम, सीवेज लाइन और सड़क का बंटवारा परेशानी का सबब बनेगा। स्थिति ये है कि नर्मदा के पानी का सम्पवैल प्रस्तावित कोलार नगर निगम में आएगा तो कोलार डैम का सम्पवैल भोपाल नगर निगम में। दोनों ही निगमों को अपने क्षेत्रों में जलापूर्ति के लिए एक-दूसरे के निगम क्षेत्र में टीम बनाना होगी। इसके अलावा होशंगाबाद रोड, नेहरू नगर, करोंद, भानपुर में 23 टंकियां ऐसी हैं, जिनका पानी भोपाल और कोलार दोनों ही निगमों की सीमाओं वाली कॉलोनियों में जाएगा। बंटवारे के बाद इस दोहरी व्यवस्था को संभालना कठिन होगा। यही हाल सड़क, सीवेज लाइन और ट्रीटमेंट प्लांट की भी है। विशेषज्ञों के मुताबिक बंटवारे के बाद होने वाली परेशानियों से बचने के लिए जलापूर्ति सिस्टम पीएचई को हैंडओवर करना चाहिए। इसी तरह सड़कों का जिम्मा सीपीए या पीडब्ल्यूडी जैसी विशेषज्ञ संस्था को दिया जाए। ऐसे में नगर निगम के पास सफाई और संपत्तिकर का काम होगा, जिसका आसानी से बंटवारा हो सकता है।

ऐसे समझें, क्यों मुश्किल है बंटवारा

-23 पानी की टंकियां, दो बड़े सम्पवैल दोनों निगमों की उलझन हैं। एक निगम क्षेत्र में मौजूद टंकी से दूसरे में जलापूर्ति कैसे होगी? यदि पानी बंद किया तो वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी? ये कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब न तो जिला प्रशासन और न ही नगरीय प्रशासन विभाग के पास है। सभी मामले को दिखवाने की बात कह रहे हैं।

-कोलार नगर निगम के प्रस्तावित क्षेत्र करोंद, भानपुर, गोविंदपुरा में सीवेज लाइन तो है, पर पर्याप्त ट्रीटमेंट प्लांट नहीं हैं। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भोपाल नगर निगम की सीमा में है। सवाल ये है कि इस प्लांट से दूसरी नगर निगम का सीवेज क्यों ट्रीट किया जाएगा? अमृत योजना की 200 किमी लंबी सीवेज लाइन कोलार समेत भोपाल नगर निगम सीमा में भी है। ऐसे में एक नेटवर्क का दो नगर निगम कैसे प्रबंधन करेंगे?

-नगर निगम की 2500 किमी लंबी सड़कों में से 600 किमी की रोड दोनों नगर निगमों में है। इनके निर्माण और मेन्टेनेंस में परेशानी आएगी। चार लाख की आबादी सीधी प्रभावित होगी।

एक्सपर्ट बोले— पानी सड़क का जिम्मा संभालें दूसरी एजेंसियां

-जलापूर्ति एक्सपर्ट आरबी राय का कहना है कि निगम में जलापूर्ति का जिम्मा संभालने वाले सभी इंजीनियर पीएचई के हैं। सिस्टम भी पीएचई का है। ऐसे में यदि शहर की जलापूर्ति व्यवस्था नगर निगम से वापस लेकर इसी तरह की अन्य एजेंसी या पीएचई को देना चाहिए। इससे जलापूर्ति व्यवस्था बेहतर होगी। प्रोजेक्ट भी समय पर पूरे होंगे।

-सीवेज सिस्टम एक्सपर्ट आरके त्रिवेदी बताते हैं कि राजधानी के सीवेज सिस्टम को प्रबंधन के लिहाज से अलग नहीं किया जा सकता। ये एक दूसरे से मिलकर ही बना है। यदि दो नगर निगम बनती हैं तो दोनों को इसके लिए संयुक्त टीम बनानी होगी।

-पूर्व टाउन प्लानर वीपी कुलश्रेष्ठ का कहना है कि शहर की सड़कें और अन्य निर्माण के लिए राजधानी परियोजना प्रशासन का गठन हुआ था। शहर की सड़कें सीपीए को सुपुर्द की जाएं। वैसे भी नगर निगम के पास खुद के इंजीनियर नहीं हैं। तकरीबन सभी इंजीनियर प्रतिनियुक्ति पर सीपीए या पीडब्ल्यूडी से आए हैं।

जो बेहतर होगा वही करेंगे

अभी सुझाव-आपत्तियां आ रही हैं। संबंधित अफसर शहरहित में जो बेहतर होगा, वही करेंगे। दिक्कत जैसी कोई बात नहीं है।
संजय दुबे, प्रमुख सचिव, नगरीय प्रशासन

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