...तो इसलिए एक बाद एक डॉक्टर्स छोड़ रहे हैं हॉस्पिटल

दो सालों में दो दर्जन से ज्यादा सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर अस्पताल छोड़ गए। डॉ. योगेश निवारिया ने करीब आठ साल पहले बतौर असि. प्रोफेसर ज्वाइन किया था।

By: Juhi Mishra

Published: 18 Aug 2017, 07:36 AM IST

 भोपाल। गैस कांड का दंश झेलने वाले लाखों लोगों की सेवा का सपना लेकर भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर (बीएचएमआरसी) आने वाले डॉक्टरों को अब सेवा कड़वी लगने लगी है। सालों की नौकरी के बाद भी कॅरियर की सीढ़ी छोटी होती जा रही है। उन्हें उम्मीद थी कि सेवा के बदले सरकार कुछ मीठा प्रतिफल देगी, लेकिन 10 साल बाद भी ये डॉक्टर्स खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। ऐसे में डॉक्टरों ने सेवा छोड़ कॅरियर को तरजीह देना शुरू कर दिया है। शुक्रवार से दिल के मरीजों को भी दिक्कत होगी, क्योंकि एकमात्र कार्डियो सर्जन एम्स जाने वाले हैं।

 

दो सालों में दो दर्जन से ज्यादा सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर अस्पताल छोड़ गए। डॉ. योगेश निवारिया ने करीब आठ साल पहले बतौर असि. प्रोफेसर ज्वाइन किया था। नियमों के मुताबिक छह साल की सेवा के बाद उन्हें प्रोफेसर बन जाना चाहिए, लेकिन सेवा भर्ती नियम ना बनने के बावजूद डॉ. निवारिया जैसे तमाम चिकित्सक सालों बाद भी वेतन व पदोन्नति का इंतजार करते रहे। उन्होंने सरकार को खत लिखने के साथ तमाम आंदोलन भी किए, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

 

अस्पताल छोडऩे वाले चिकित्सकों का कहना है कि वे सेवा भाव से अस्पताल आए थे, लेकिन इतने सालों में उनकी सेवा का कोई प्रतिफल नहीं मिला। भर्ती नियम नहीं बनने से वे सालों से एक ही पद पर काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर दो तीन साल तक वे यहीं काम करते तो फिर अन्य संस्थानों में जाने के लायक भी नहीं बचते। कॅरियर के लिए दूसरे अस्पताल जाना हमारी मजबूरी है।

 

फंड को लेकर खींचतान
बर्बादी के पीछे बड़ा कारण बैंकों में रखा 740 करोड़ रुपए का कार्पस फंड भी है। केन्द्र इसे राज्य को देना चाहता है, लेकिन बिना कार्पस फंड के। वहीं राज्य सरकार इसे बिना कार्पस फंड के नहीं लेना चाहता। ऐसे में दो सालों से बीएमएचआरसी का काम पूरी तरह से रुका हुआ है।

 

नहीं हो रहे अपॉइंटमेंट
अस्पताल के हालात देख यहां नए चिकित्सक आने से कतरा रहे हैं। बीते सालों में एक दर्जन बार भर्ती प्रक्रिया होने के बाद भी चिकित्सक नहीं आए। जबकि प्रबंधन इन्हें मौजूदा डॉक्टरों से ज्यादा वेतन, सुविधाएं दे रहा था।

एक मात्र एक्स रे मशीन भी बंद
गुरुवार को अस्पताल की एक्स रे मशीन भी बंद हो गई, जिससे मरीजों को बिना एक्स-रे के लौटना पड़ा। एक्स-रे नहीं होने से मरीजों की कंसलटेंशन नहीं हो पाई। सिर्फ एक्स-रे मशीन हीं नहीं अस्पताल की रेडियोलॉजी विंग, कैथलैब तक बंद हो चुकी हैं।

 

एक और हृदय रोग विशेषज्ञ भी जाएंगे
कैंसर मरीजों के बाद अब हार्ट की तकलीफ से जूझ रहे गैस पीडि़तों को भी जूझना पड़ेगा। दरअसल अस्पताल के एकमात्र कार्डियो सर्जन डॉ. योगेश निवारिया शुक्रवार से एम्स ज्वाइन करने वाले हैं। एक और हृदय रोग विशेषज्ञ भी जल्द ही एम्स चले जाएंगे। अस्पताल में आने वाले 200 से ज्यादा मरीजों को दिक्कत होगी।

 

बदहाली के कारण
० डॉक्टर सहित अन्य कर्मचारियों का कॅरियर खराब होना
० ट्रस्ट से केन्द्र के हाथ में जाने के बाद अस्पताल में भ्रष्टाचार बढ़ा
० ज्यादातर उपकरण डेढ़ दशक पुराने हैं
० उपकरणों की खरीदी प्रक्रिया बेहद जटिल है
० केन्द्र के हाथों में तो गया, लेकिन उसके भर्ती नियम नहीं बने
० नए विभाग, पीजी कोर्स जैसे काम शुरू करने में प्रबंधन की लापरवाही
० अस्पताल को लेकर कोई स्थायी पॉलिसी ना होना
० डीएनबी कोर्स बंद होना, पीजी इंस्टीट्यूट ना बन पाना
० कॅरियर होने लगा था खराब

 

इनका कहना है-
० अस्पताल की स्थिति बेहद खराब है। अब इसे पुराने स्वरूप में लौटाने का एक ही तरीका है कि इसे पीजी इंस्टीट्यूट बना दिया जाए। हालांकि अब वो भी बहुत मुश्किल है।
डॉ. मनोज पांडे, पूर्व डायरेक्टर

० जो डॉक्टर्स छोड़कर जा रहे हैं उन्हें रोका नहीं जा सकता। हां मरीजों को दिक्कत न हो इसके लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। कुछ विभागों में ऑनकॉल डॉक्टर्स बुलाए गए हैं। वहीं कुछ अन्य अस्पतालों से बात की गई है।
सौम्या स्वामीनाथन, सचिव, डीएचआर

० सरकारी लापरवाही के चलते इस अस्पताल को बर्बाद कर दिया। अब गैस पीडि़तों के लिए कोई अस्पताल नहीं बचा। इसकी पूरी जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की है। वे चाहे तो अब भी अस्पताल को फिर से खड़ा किया जा सकता है।
अब्दुल जब्बार, सामाजिक कार्यकर्ता

Juhi Mishra
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