scriptdr gulab kothari addressed LNCT Group of Colleges in bhopal | क्रोध का बोध मन में आ जाए तो कभी गुस्सा नहीं आएगा, 'गीताविज्ञान' पर डॉ. गुलाब कोठारी का संबोधन | Patrika News

क्रोध का बोध मन में आ जाए तो कभी गुस्सा नहीं आएगा, 'गीताविज्ञान' पर डॉ. गुलाब कोठारी का संबोधन

patrika.com पर प्रस्तुत है राजधानी के एलएनसीटी कॉलेज परिसर से डॉ. कोठारी का संवाद कार्यक्रम...।

भोपाल

Updated: August 06, 2022 01:17:28 pm

भोपाल। पत्रिका समूह के प्रधान संपादक डॉ. गुलाब कोठारी (dr gulab kothari ) शनिवार को भोपाल में थे। उन्होंने एलएनसीटी कॉलेज परिसर (Lakshmi Narain College of Technology) में स्टूडेंट्स, प्रोफेसर्स एवं शहर के प्रबुद्धजनों को 'गीताविज्ञान' की बारीकियों से अवगत कराया। कार्यक्रम का विषय ही था 'गीता विज्ञान आने वाले कल के लिए...।'

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इस भव्य में बड़ी संख्या में शहर के गणमान्य लोगों के साथ ही दुनियाभर से हजारों लोग ऑनलाइन जुड़े थे। पत्रिका.कॉम के साथ ही पत्रिका मध्यप्रदेश के फेसबुक पेज और यूट्यूब पर इस आयोजन का सीधा प्रसारण देखा। कार्यक्रम में श्रोताओं ने अपनी जिज्ञासा से भरे प्रश्न भी डॉ. गुलाब कोठारी से पूछे, जिसका उन्होंने उदाहरण सहित समझाया।

Patrika .com पर प्रस्तुत है राजधानी के एलएनसीटी कॉलेज परिसर से डॉ. कोठारी का संवाद कार्यक्रम...।

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Updates

01.15 pm

अंत में डा. कोठारी ने एलएनसीटी ग्रुप के चेयरमेन को गीताविज्ञान पर एक पुस्तक भी भेंट स्वरूप दी। इस पुस्तक को छात्रों के लिए लाइब्रेरी में रखा जाएगा।
01.13 pm

मन और आत्मा के अलग-अलग होने बारे में पूछे गए सवाल डा. कोठारी ने कहा कि मन केंद्र में है। मन शरीर से जुड़ा है और आत्मा से भी जुड़ा है। इसके साथ ही मन इच्छा के साथ पैदा होता है। इच्छा पूरी होते ही मन भी खत्म हो जाता है। फिर नई इच्छा के साथ पैदा होता है।
01.00 pm

प्रश्नों के भी दिए जवाब

डॉ. कोठारी ने श्रोताओं के प्रश्नों के भी जवाब दिए। क्रोध आने पर पूछे गए प्रश्न पर डा. कोठारी ने कहा कि एक मिनिट अपने मन से पूछा कि मुझे क्रोध क्यों आया। कहीं न कहीं मेरे ईगो पर ठेस लगी है तो क्रोध आया। मेरे काम में कोई अड़चन आई तो मुझे क्रोध आया। मेरा सबसे करीबी मित्र मेरी बात नहीं सुन रहा है तो सबसे ज्यादा क्रोध उसी पर आता है। जहां गुस्सा है वहीं प्रेम है। जहां सबसे ज्यादा प्रेम है वहीं गुस्सा आता है। यह साइकिल चलती रहती है, यह सिक्के के दो पहलू है। लाइट और बढ़ा दो तो अंधकार कम हो जाएगा।

डा. कोठारी ने कहा कि हम गलती क्या करते हैं कि हम अपने दुख को मिटाने का प्रयास करते हैं। यत्न करते हैं कि सुख साथ रहे। दुख चले गया तो सुख भी साथ चले गया। एक का अस्तित्व चले गया तो दूसरा भी चले जाता है। इसे समझना चाहिए। क्रोध को दबाना नहीं चाहिए। स्प्रिंग के तरह बाहर आता है। इसलिए क्रोध की भावना को दबाने का प्रयास न करें। क्रोध को समझें कि यह क्यों हुआ। इसलिए क्रोध का बोध जरूरी है।


12.55 pm

डॉ. कोठारी ने बीज और फल का उदाहरण देते हुए कहा कि एक बीज पेड़ बनता है तो उसके फल समाज को मिलते हैं। जीवन की सार्थकता कहा है। बीज के जीवन की सार्थकता कहा है। पेड़ बनने में। पेड़ नहीं बना तो जिंदगी बेकार हो गई उसकी। पेड़ कैसे बना। जब वो खुद जमीन में गड़ गया। उसके बगैर कैसे बन सकता है। यह है शिक्षा, ज्ञान का, अन्न का मूल स्वरूप और परिणाम। बीज जमीन में गड़ेगा तो पेड़ बनेगा। कौन फल खाएगा, कौन छाया में बैठेगा, कौन घोंसला बनाएगा इसका कोई लेनदेन नहीं। कोई पत्ता टहनी के लिए काम नहीं करता। दूसरे हिस्से के लिए भी काम नहीं कर रहा है। वो केवल अपना काम कर रहा है। पेड़ के सभी प्रकार के अवयव फल के लिए काम कर रहे हैं। इससे किसी का कोई लेनदेन नहीं है। जिंदगी की गहराई ईश्वरीयता का भाव, मां भाव देने को कहते हैं। जो उस बीज ने अपनी जिंदगी छोड़ दी। क्या दे क्या, कितना दे गया और इतना दे गया कि आने वाली पीड़ी को दे गया। मैंने जो कमाया मेरे बच्चों को काम आएगा। आगे आने वाली पीड़ी को मिलेगा। आपका व्यक्तित्व काम आएगा। आपने जो समाज को दिया, बच्चों के काम आएगा। समाज का निर्माण करके जाना पड़ेगा।
12.50 pm
आखों पर पट्टी बांधकर भी आपको पता चल जाना चाहिए कि यह खाना मां ने बनाया है या नहीं। मन की ताकत को भी समझना है। मेरे मन का निर्माण मेरा जीवन है, मेरा व्यक्तित्व है, मेरा भविष्य है। यदि मन से नहीं बता पाए कि यह खाना किसने बनाया तो व्यर्थ है। इसलिए हमारे मन का निर्माण होना जरूरी है। रसहीन होगा वो खाना। मां जब खाना बनाती है तब उनके पास खड़े हो जाओ। मां के मन के भाव को समझो। मन का निर्माण कहां हो रहा है। यहां होता है। पत्नी के पास होता है।

12.45 pm
समय का मोल समझें। वर्तमान में जीना। समय की कीमत समझनी है तो एक-एक घंटा महत्वपूर्ण है। कही भी व्यर्थ समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। यह जीवन का सबसे अमूल्य समय है।

12.43 pm
मन को अन्न से जोड़ते हुए डॉ. कोठारी ने कहा कि पीत्जा और बर्गर की तरफ लोग आकर्षित होते हैं, यह हमारे देश का अन्न नहीं है।
12.40 pm
कर्म ही पूजा है। यह कभी धोखा नहीं देता है। यह हर व्यक्ति को करना चाहिए।

12.30 pm
एलएनसीटी कॉलेज के छात्रों को संबोधित करते हुए कोठारी ने कहा कि माता-पिता पूरा जीवन अपने बच्चों को पढ़ाने में बढ़ाने में पैसा खर्च करते हैं। सभी चाहते हैं अच्छी लाइफ स्टाइल हो, अच्छी गाड़ी हो। यह जीवन का लक्ष्य हो सकता है, हमारे शरीर को आराम तो मिल जाएगी, लेकिन मेरा मन, मेरी आत्मा को क्या मिलेगा।
12.20 pm

डा. कोठारी ने अन्न खाने के बारे में भी कहा कि जैसा खाएंगे अन्न वैसा हो जाएगा मन। हम सात्विक अन्न खाएंगे तो विचार भी सात्विक हो जाएंगे। कई बीमारियों हमारे विचारों से उत्पन्न होती है, जो दवाओं से ठीक नहीं होती है। यह शुरुआत मेरे अन्न से हुई, मन से होकर विचारों तक गई और बीमारी बनकर मेरे शरीर में बीमारी बन गई। यह मेरे स्वरूप तक चले गई।
12.15 pm
डा. कोठारी ने मन के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि मन इच्छा के साथ पैदा होता है। उसका कोई आकार नहीं है। इच्छा पैदा हुई है तो मन पैदा हुई है। क्योंकि इच्छा में एक्शन नहीं है। उसमें डिजायर नहीं है। बगैर डिजायर के कर्म नहीं होगा। जिस का ज्ञान नहीं होगा उसका डिजायर आ नहीं सकता।
Live- यूट्यूब पर लाइव देखने के लिये यहां क्लिक करें

12.01 PM

डॉ. कोठारी ने कहा कि गीता शरीर के लिए नहीं लिखी गई है। माता-पिता ने शरीर को पैदा किया। लेकिन शरीर के भीतर जो सूक्ष्म रूप में रहती है वो आत्मा है।
11.55 AM

डा. गुलाब कोठारी का संबोधन शुरू। गीता विज्ञान की जरूरत क्यों हैं हमें।
11.50 AM
डा. गुलाब कोठारी के जीवन संघर्ष और उनके संग्रहों के बारे में श्रोताओं को जानकारी दी गई।
11.45 AM
डा. कोठारी का सभा में मौजूद श्रोताओं ने खड़े होकर स्वागत किया। एलएनसीटी ग्रुप के डायरेक्टर्स ने पुष्पगुच्छ के साथ स्वागत किया।

11.40 AM
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक डॉ. गुलाब कोठारी एलएनसीटी ग्रुप के सभा कक्ष में पहुंचे।

गीता का सिद्धांत कर्म का सिद्धांत है

इससे पहले, डॉ. कोठारी ने शुक्रवार को इंदौर की सेज यूनिवर्सिटी परिसर में आयोजित गीता विज्ञान के विषय पर कहा कि आत्मा का यात्रा मार्ग शरीर है। मंजिल क्या है, इसे समझने के लिए विवेक होना जरूरी है। वर्ण और आत्मा के हिसाब से कर्म तय करेंगे तो सफलता मिलेगी। यही बात गीता सिखाती है। इसके विपरीत किए गए कार्यों से परिणाम नहीं मिलेंगे। गीता का सिद्धांत कर्म का सिद्धांत है। भाव यह होना चाहिए कि बीज बोना मेरे हाथ में है, फल लगेंगे या नहीं, लगे तो किसे मिलेंगे, इस पर मेरा वश नहीं है। मन फल के स्वरूप में अटक जाता है, जिससे सफलता का इंडेक्स नीचे आ जाता है।

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