scriptFirst God killed, now government helplessness is killing | पहले भगवान ने मारा, अब सरकारी लाचारी मार रही | Patrika News

पहले भगवान ने मारा, अब सरकारी लाचारी मार रही

cहे भगवान! दिव्यांग खिलाड़ियों के इतने बुरे हाल

भोपाल

Updated: May 07, 2022 05:55:37 pm

रूपेश मिश्रा

सरकारी दावे और वादे चाहे जो कर दिए जाएं लेकिन उनका असल हश्र क्या होता है उसकी कलई खुद खुलकर सामने आ जाती है। बात जब दिव्यांग खिलाड़ियों की होती है तो बात उनके हौसले की भी होती है। लेकिन सवाल तब खड़ा होता जब अंजाम तक पहुंचने पहले ही उनके हौसले दम तोड़ने लगते है। और ये इसलिए नहीं दिव्यांग खिलाड़ियों के हौसले टूट जाते हैं बल्कि ये इसलिए होता है कि सरकारी दावे और वादे करने वालों को हौसले ही टूटे हुए हैं। इसे इंतहा ही कहा जाएगा कि जिन्हें पहले भगवान ने मारा उन्हें अब सरकारी लाचारी भी मार रही है। दरअसल प्रदेश के कई दिव्यांग खिलाड़ियों का अब ऐसा हाल है कि अगर अब उन्हें सरकारी मदद नहीं मिली तो खेल के मैदान को छोड़ने के लिए विवश हो जाएंगे। और देश के लिए मैडल लाने का सपना भी काफूर हो जाएगा।

सचिन साहू-

प्रदेश के रीवा जिले में ठेला लगाकर जीवन यापन कर रहे दिव्यांग खिलाड़ी सचिन साहू एथलिट हैं। सचिन का एक हाथ और एक पैर काम नहीं करता है। लेकिन हौसले से लबरेज सचिन ने हालही में उड़ीसा के भूवेनश्वर स्थित कलिंगा स्टेडियम में मार्च माह में आयोजित हुई 20वीं नेशनल पैरा एथलीट चैंपियनशिप में 400 मीटर दौड़ में ब्रांज मैडल जीता है। इनके पिता भी ठेला चलता हैं। चार बहन और दो भाई हैं। घर की माली हालात ऐसी है सचिन के पास दौड़ने के लिए जूते खरीदने तक के पैसे नहीं है। सचिन ने कहा कि जब दो वक्त के खाने के पैसे नहीं है तो बताइए पेट काटकर कब तक तैयारी करें। सरकार कुछ तो मदद करे।

गोविंद सिंह भदौरिया-

प्रदेश के भिंड जिले भदापुर गांव के रहने वाले गोविंद सिंह भदौरिया का एक पैर काम नहीं करता है। लेकिन इसके बावजूद तिरंदाजी से जीवन का लक्ष्य भेदने का हौसला रखते हैं। अभी हालही में हरियाणा के जिंद में आयोजित हुई नेशनल चैपिंयनशिप में ऑल इँडिया 17वीं रैंक हासिल की है। अप्रैल माह में एशिया कप का ट्रायल देकर आए हैं और 14वीं रैंक लगी है। लेकिन इनकी बेबसी ऐसी है कि धनुष और तीर तक खरीदने को पैसा नहीं है। एक दोस्त ने धनुष दिलाया तब चैपिंयनशिप में हिस्सा ले पाए। गोविंद सिंह ने बताया कि जबलपुर एकेडमी में प्रयास किया कि दाखिला मिल जाए लेकिन वहां कोई बात करने को ही तैयार नहीं इसलिए अब राजस्थान के जयपुर में दोस्त की ही मदद से प्राइवेट एकेडमी में तैयारी कर रहा हूं। गोविंद ने कहा कि एक कमरे में पूरा परिवार रहता है। खाने के पैसे नहीं पिता कहां से धनुष और तीर दिलाएंगे।

रामबरण यादव-

महज डेढ़ साल की उम्र में दोनों हाथ गवा बैठे रामबरण यादव अभी मध्यप्रदेश डिसेबल क्रिकेट टीम के उपकप्तान हैं और कभी बैडमिंटन खेला करते थे। ग्वालियर के बंधौली गांव में पिता खेती करके जीवन यापन करते हैं। रामबरण यादव ने कहा कि इश्वर ने दोनों हाथ तो छिन लिए लेकिन हौसला अभी भी बरकरार है। अगर सरकारी स्तर पर हम दिव्यांग खिलाड़ियों को मदद मिले तो हम भी देश का गौरव बढ़ा सकते हैं।

जिम्मेदार ये बोलें

आप तीनों बच्चों की डिटेल हमें भेजिए। हम राज्य के जिम्मेदार अधिकारियों से बात कर के तत्काल ऐसे पैरा खिलाड़ियों की मदद करवाएंगे। जिनके अंदर हुनर है उनकी मदद होनी चाहिए। आपने बताया एक पैरा एथलिट के पास जूते तक नहीं हैं। तत्काल उनकी मदद होगी।

राहुल स्वामी, चीफ एडमिनिस्ट्रेटर, ऑल इंडिया पैरालंपिक कमेटी

भारत सरकार ने पैरा खिलाड़ियों को बहुत मान- सम्मान दिया है। लेकिन राज्यों में आज भी पैरा खिलाड़ियों के लिए जो सुविधा होनी चाहिए वो नहीं है इससे इंकार नहीं किया जा सकता। अगर पैरा खिलाड़ी पैसे के अभाव में खेल छोड़ने को विवश हैं तो ये बेहद दुखद है। आपके माध्यम से मैं मध्यप्रदेश सरकार से अपिल करना चाहूंगा कि इनकी तत्काल मदद की जाए।

जेवलिन स्टार देवेंद्र झाझड़िया, पद्मभूषण

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