सरकार की सख्तीः मरीजों का इलाज बीच में छोड़ने वाले डॉक्टरों को हो सकती है छह माह की जेल

सरकार की सख्तीः मरीजों का इलाज बीच में छोड़ने वाले डॉक्टरों को हो सकती है छह माह की जेल

By: Faiz

Published: 24 Jul 2018, 04:04 PM IST

भोपालः भोपालः वेतन वृद्धि, सुरक्षा समेत पांच सूत्रीय मांगो को लेकर हड़ताल के बाद सामुहिक इस्तीफा देने वाले 1500 से ज्यादा जूनियर डाक्टरों पर अपने कामबंद से व्यवस्थाओं को अवरुद्ध करने के जुर्म में सरकार सख्त कार्रवाई कर सकती है। ऐसा इसलिए भी संभव है कि, सोमवार को जब जूडा ने हड़ताल शुरु की थी, उसके बाद ही सरकार द्वारा उनपर सेवाएं अवरूद्ध होने के चलते एस्मा लगा दिया था। हालांकि, इधर विरोध में आए जूडा ने सामुहिक तौर पर इस्तीफा दे दिया है। जिससे प्रदेश के पांच बड़े अस्पतालों में मरीजों की स्थिति बिगड़ गई है।

यह हो रही परेशानियां

अस्पतालों में जहां जूनियर डाक्टरों के ना होने के चलते मरीजों से जुड़ी छोटी छोटी चीजों पर भी ध्यान रख पाना काफी मुश्किल हो रहा है, जिसके चलते कई अस्पतालों से मरीजों को मजबूरन बीमारी साथ लेकर ही घर लौटना पड़ रहा है, या फिर मजबूरन वहां बैठकर एक आस के साथ उनकी विधा सुनने के लिए आने वाले शुभचिंतक का इंतेज़ार करना पड़ रहा है। शहर के हमीदिया अस्पताल में एडमिट किसी मरीज या उसके परिजन को इस मामले में सरकार दोषी नज़र आ रही है। तो किसी को जूडा के रवय्यै में खोट नज़र आ रहा है। कोई सरकार पर आरोप लगा रहा है कि, उसे उन लोगों की सेवा में कसर नहीं छोड़नी चाहिए जो दूसरों की सेवा में हमेशा किसी भी समय तत्पर रहते हैं। तो कोई यह कहते हुए नज़र आया कि, अपने फायदे के लिए डॉक्टर उन्हें परेशान कर रहे हैं, जो पहले से ही काफी दुखी हैं।

सजा के के साथ जुर्माना

स्वास्थ विभाग के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सरकार इसके खिलाफ अब बड़ा कदम उठाने की तैयारी में जुट गई है। सूत्रों के हवाले से यह बात भी सामने आई है कि, अब सरकार इसपर तुरंत फैसला लेते हुए प्राइवेट डॉक्टरों की भर्ती करने पर विचार कर रही है। साथ ही, इस्तीफा देने वाले डाक्टरों पर एस्मा के तहत कार्रवाई करने की योजना तैयार है। इसमें प्राथमि दाने साथ ही, एस्मा एक्ट तहत छह महीने की सज़ा या 250 रुपए जुर्माना लगाया जाएओगा।

यह होता है एस्मा

हड़ताल रोकने के लिए सरकार ने प्ररदर्शकारियों पर एसेंशियल सर्विसेज मेनेजमेंट एक्टएस्मा लगाई जाती है ताकि, उनके प्रदर्शन के कारण व्यवस्थाएं अवरुद्ध ना हों। एस्मा कुछ विभागों पर ही लगाई जा सकती है। इनमें वह सरकारी विभाग शामिल होते है, जिनके प्रदर्शन के चलते आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। बता दें कि, एस्मा लागू कने से पहले इससे प्रभावित होने वाले लोगों को कानून लागू करने से पहले अखबार या किसी अन्य माध्यम के ज़रिए सूचित कर दिया जाता है कि, इस कानून के लागू होने के बाद संबंधित व्यक्ति पर आने वाली परेशानियों का ज़िम्मेदार भी पवह खुद होगा।

इतनी होगी सज़ा

एस्मा ज्यादा से ज्याद किसी विभाग के विरोधियों पर छह महीने ही लगाया जा सकता है। हालांकि, इसके लागू होने के बाद अगर कोई भी व्यक्ति वही विरोध करते हुए नजर आ जाता है तो उसे अवैध और दंडनीय अपराध मानकर बिना किसी सूचना गिए गिरफ्तार किया जाता है। सरकार को एस्मा लगाने का फैसला इसलिए भी लेना पड़ता है, क्योंकि इससे आवश्यक सेवाओं पर बुरा असर पड़ सकता है। यानि कुल मिलाकर यूं कहें कि, अनिवार्य सेवाओं को बनाए रखने के लिए इसे लागू किया जाता है। एस्मा लागू होने वाले से जुर्माने के तौर पर ढाई सौ रुपए वसूले जाते है, साथ ही छह महीने की सज़ा भी होती है।

एस्मा की शुरुआत

एस्मा सरकार का एक ऐसा हथियार है, जिससे वह किसी भी बड़े से बड़े आदोलन को कुचल सकती है। क्योंकि, हड़ताल के कारण वह संबंधित विरोधी हड़ताल नहीं कर सकते अगर वह ऐसा करता है तो बिना किसी वॉरंट के कर्मचारी और नेताओं क गिरफ्तार कर सकती है। बता दें कि, वैसे तो एस्मा एक केंद्रीय कानून है, जिसे में लागू किया गया था, लेकिन राज्य सरकारों को इसे ले स्वतंत्रता मिल गई थी। वैसे तो एस्मा कानून को 1968 में लागू किया गया था। राज्य सरकारें इस कानून को लागू करने के लिये स्वतंत्र हैं। उल्लेखनीय है कि थोड़े बहुत परिवर्तन कर कई राज्य सरकारों ने स्वयं का एस्मा कानून भी बना लिया है और अत्यावश्यक सेवाओं की सूची भी अपने अनुसार बनाई है।

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