एक किस्सा: व्यापमं महाघोटाले की ऐसी कहानी जो रह गई अधूरी, होने वाला था 'बड़ा' खुलासा

तत्कालीन राज्यपाल के निधन के बाद अधूरी रह गई थी वो आत्मकथा, जिसमें लिखने वाले थे व्यापमं की पूरी कहानी...।

By: Manish Gite

Published: 01 Jul 2020, 10:30 AM IST


भोपाल। मध्यप्रदेश के राज्यपाल रह चुके रामनरेश यादव (Ram Naresh Yadav) की उस पुस्तक की आज भी चर्चा होती है। ऐसी पुस्तक जिसका दूसरा भाग आने वाला था और वे उसके पन्ने पर कुछ ऐसी चीजें लिखने वाले थे, जिससे राजनीति में भूचाल आ जाता। दरअसल, राज्यपाल रामनरेश यादव आत्मकथा का एक भाग लिख चुके थे। और उन्होंने कहा था कि वे व्यापमं और उससे जुड़ी कई बातों को अपनी आत्मकथा के दूसरे भाग में बताएंगे। अफसोस, यादव का निधन हो गया और और उनकी व्यापमं महाघोटाले से जुड़ी कहानियां अधूरी रह गईं।

 

patrika.com आपको बता रहा है इतिहास के पन्नों में से कुछ किस्से, जो लोग जानना चाहते हैं।

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1 जुलाई 1928 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में जन्मे रामनरेश यादव जो लिख रहे थे, उसका इंतजार हर कोई कर रहा था। आत्मकथा का एक हिस्सा रिलीज हो गया था, दूसरे की तैयारी थी। अफसोस ऐसा नहीं हो सका। किसी को नहीं पता था कि व्यापमं के कई राज जो सिर्फ रामनरेश यादव से जुड़े थे, वे उनके साथ ही चले जाएंगे। देश का सबसे चर्चित एजुकेशन घोटाले में उनकी भागीदारी किसी सबूत की मोहताज नहीं थी। मौत के बाद भी वे व्यापमं घोटाले से पूरी तरह से बरी नहीं हुए थे।

 

200 पन्नों में लिखी ‘मेरी कहानी’
राज्यपाल पद पर रहते हुए उन्होंने ‘मेरी कहानी’ नाम से अपनी राजनीतिक जिंदगी का सफरनामा लिखा था। 200 पन्नों की इस किताब में कांग्रेस के प्रति आभार भी व्यक्त किया गया है, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी, चरण सिंह और वीपी सिंह जैसे उनके जमाने के तमाम दिग्गजों का नाम तक नहीं लिया। लेकिन, ये किताब इसलिए अधूरी नहीं है। अधूरा रहने की वजह है, इस किताब में व्यापमं घोटाले में उनकी भूमिका और संलिप्तता का उल्लेख न मिलना। अब भी लोग उनकी अधूरी कहानी में से व्यापमं से जुड़े पहलुओं को खोजकर यह कहानी पूरी करना चाहते हैं, लेकिन शायद अब मुमकिन नहीं है।


यह बात सही है कि जब व्यापमं से पर्दा उठा तो धड़ाधड़ गिरफ्तारियां होने लगी थीं, जांच कमेटी अपनी पूरी रफ्तार से दौड़ लगा रही थी। तब संवैधानिक पद पर होने के कारण नाम आने के बावजूद यादव को गिरफ्तार नहीं किया गया। लेकिन, उनकी व्यापमं मामले में संलिप्तता सामने आना बड़ी बात थी। इससे भी बड़ी बात थी, उनके बेटे शैलेष यादव की मौत। व्यापमं घोटाले में फंसे उनके बेटे शैलेष की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत होने के बाद भी उनकी आत्मकथा में इस घटना को जगह नहीं मिली।

 

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वो यादें भी नदारद
अपनी कहानी में यादव ने ईमानदारी के साथ इस बात की चर्चा की थी कि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह उन पर आंख बंद करके भरोसा करते थे पर व्यापमं वाले हिस्से को वे नहीं लिख पाए, जबकि इस घोटाले मे फंसे उनके बेटे शैलेष यादव की रहस्यमय मौत हो गई थी और उनका विश्वसनीय ओएसडी धनराज यादव भर्तियों के बदले घूस लेने के आरोप में जेल चले गया।

 

पिता पर आंच आते देख बेटा था तनाव में
व्यापमं महाघोटाले के चलते ये पहलू सबसे ज्यादा चर्चा में रहा कि अपनी गिरफ्तारी के डर के कारण और पिता की प्रतिष्ठा दांव पर लगते देख उनके बेटे शैलेष यादव ने खुदकुशी कर ली अथवा फिर इस तनाव को बर्दाश्त न कर पाने के कारण उसकी असामयिक मृत्यु हो गई। वास्तविक कारण जो भी रहा हो, अपनी किताब में रामनरेश यादव इससे भी कन्नी काट गए थे।

रामनरेश यादव की ‘मेरी कहानी’ में उनके राजनीतिक सफर की कहानी ही भरपूर है। इस किताब में उन्‍होंने कांग्रेस में आने, सीएम बनने और यूपी में उनके सीएम रहते समय हुए सांप्रदायिक दंगों को सुलझाने के घटनाक्रम के बारे में काफी कुछ बताया, लेकिन राज्यपाल के तौर पर उनके कार्यों को किताब में न के बराबर ही जगह मिली है।


नहीं लिखी जाएगी अगली कहानी
किसी हिन्दी फिल्म की तरह ही उनकी कहानी भी अधूरी रह गई, जिसमें दर्शक अपने पसंदीदा हीरो की एन्ट्री का इंतजार करते रह जाते हैं, लेकिन फिल्म के अंत में उसे अगली किस्त में दिखाने का वादा कर दिया जाता है। शायद अब ये इंतजार कभी खत्म नहीं होगा, क्योंकि अगली कहानी अब कभी नहीं लिखी जाएगी। रामनरेश यादव का 89 वर्ष की उम्र में 22 नवंबर 2016 को निधन हो गया था। मध्य प्रदेश के राज्यपाल पद की जिम्मेदारी संभालने वाले रामनरेश यादव मुद्दतों तक व्यापमं महाघोटाले की वजह से चर्चाओं में याद किए जाते हैं।

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