नेता पर ग्राउंड रिपोर्ट

नेता पर ग्राउंड रिपोर्ट
madhyapradesh-mahamukabla-2019

Anil Chaudhary | Updated: 22 May 2019, 05:16:15 AM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

- व्यंग्य - अजहर हाशमी

सपने में इस व्यंग्यकार को संपादक का संदेश मिला कि लोकसभा के सातों चरणों के चुनावों में भारतवर्ष में बूथ-टू-बूथ घूमकर मतदाताओं पर नहीं, नेताओं के व्यवहार, चाल-ढाल और भाषा पर 'ग्राउंड रिपोर्टÓ भेजो। व्यंग्यकार समझ गया कि मतदाताओं पर तो सर्वे करके कुछ एजेंसियां और मीडिया हाउस एग्जिट पोल के नतीजे बताएंगे (बता भी चुके हैं), इसलिए नेताओं की कुंडली बांचने का कार्य उसे (व्यंग्यकार को) सौंपा गया है। न तो महाभारत के संजय की तरह दिव्यदृष्टि इस व्यंग्यकार के पास थी, न आधुनिक बाबा की तरह हाईटेक दृष्टि, किंतु नींद में था, इसलिए स्वप्न दृष्टि अवश्य थी। नींद में ही अपनी स्वप्न दृष्टि से व्यंग्यकार ने रिपोर्टर की तरह संपादक को नेता पर 'ग्राउंड रिपोर्टÓ कुछ इस तरह प्रेषित की।
'भारत देश नेताओं का देश है। अब तो इस देश में, देश के हर प्रदेश में, प्रदेश के हर संभाग में, संभाग के हर जिले में, जिले की हर तहसील में, तहसील के हर गांव में, गांव की हर गली में नेता ही नेता हैं। नेता चुनाव के पर्दे पर दिखाई जानेवाली सियासत नामक फिल्म में 'गली ब्वायÓ के रूप में हीरो का पार्ट प्ले करता है और 'गाली ब्वायÓ के रूप में विलेन का। तात्पर्य यह कि नेता के दो चेहरे होते हैं। दो मुंहेपन यानी बयान देकर पलटी मारने के मुद्दे पर नेताओं में 'राष्ट्रीय एकताÓहै। नेता चोट देने में शातिर होता है। नेता 'नोटÓ लेने में माहिर होता है। स्कूल के दिनों में नेता होमवर्क करने में कन्नी काटता था, किंतु सियासत और चुनाव के दिनों में नोटवर्क करने के लिए नजरें दौड़ाता रहता है। नोट (रुपए) देखते ही देता की बांछें खिल जाती हैं और आंखों में चमक आ जाती है। छल-कपट नेता का धंधा है। उगाही नेता का चंदा है। प्रतिशोध लेना नेता का फंदा है। नेता के बोल ऐसे कि भाषा ही शर्मिंदा है।


मकान और फाटक में जैसा संबंध है, नेता और 'नाटकÓ में वैसा संबंध है। यही कारण है कि नेता नेशन प्रेमी होता है। नेता फैशन प्रेमी होता है। नेता सम्मेलन प्रेमी होता है। नेता अधिवेशन प्रेमी होता है। नेता कानों का कच्चा होता है, लेकिन 'खाने Ó में पक्का होता है। अपवाद को छोड़ दें तो नेता को चापलूसी की 'चमचमÓ रिश्वत के 'रसगुल्लेÓ सौदेबाजी का 'सोहनहलवाÓ और खुशामद की 'खीरÓ बहुत पसंद होती है। ईमानदारी का नाम सुनते ही नेता को अपच हो जाता है और खट्टी डकारें आने लगती हैं। अब बड़े नेताओं के साथ छुटभैया नेताओं की जमात और हो गई है। जिस प्रकार खेत की फसल के साथ-साथ खरपतवार उग जाती है, उसी प्रकार बड़े नेताओं के साथ छुटभैया नेता पैदा हो जाते हैं। छुटभैया नेता खुद को खुदा समझने लगता है। स्थिति यह है कि 'बड़े मियां माशाअल्लाह तो छोटे मियां सुब्हान अल्लाहÓ।
... और अंत में यक्ष-प्रश्न :
यक्ष: कलियुग में क्या होगा ?
युधिष्ठिर: बड़बोले नेताओं की 'बाढ़Ó आएगी।
यक्ष : और क्या होगा?
युधिष्ठिर : समझदार नेताओं का 'सूखाÓ पड़ेगा।

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