सड़क पर पड़े रहते हैं घायल, 50 फीसदी लोग एंबुलेंस में भी नहीं बैठाते

सड़क पर पड़े रहते हैं घायल, 50 फीसदी लोग एंबुलेंस में भी नहीं बैठाते

Sunil Mishra | Publish: Nov, 23 2018 08:15:41 AM (IST) | Updated: Nov, 23 2018 08:15:42 AM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

108 एंबुलेंस सेवा की स्टडी

भोपाल, सीहोर रोड पर फंदा के पास कार की टक्कर से घायल 28 वर्षीय युवक की जान सिर्फ इसलिए चली गई कि उसे समय पर इलाज नहीं मिल सका। यह स्थिति तब थी जब, घटना के आधे घंटे में 150 से ज्यादा गाडिय़ां निकल गई थीं। कुछ लोग रुके भी लेकिन एक भी व्यक्ति ने युवक काअस्पताल ले जाने की जहमत नहीं उठाई। आम लोगों की इस अमानवियता का चेहरा रोज देखने को मिलता है।


108 एंबुलेंस के पायलट और इससे जुड़े डॉक्टरों की बात माने तो लगभग 50 प्रतिशत मामलों में उन्हें ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ता है। इन पायलट्स ने यह भी बताया कि कई बार एंबुलेंस स्टाफ घायल को एंबुलेंस तक पहुंचाने के लिए लोगों से मदद मांगते लेकिन कोई आगे नहीं आता। हालांकि लोग मोबाइल से वीडियो बनाते और फ ोटो जरूर खींचते हैं।

सालभर में हादसों में घायल 4500 लोग अस्पताल पहुंचे

एम्बुलेंस 108 के अधिकारियों के मुताबिक ने बताया कि शहर में हर रोज 12 से 15 मामले आते हैं। इसमें से आधे से ज्यादा घायलों के होते हैं। बीते एक साल में एंबुलेंस ने 4500 लोगों को अस्पताल पहुंचाया। इनमें करीब 3500 लोग सड़क हादसे में घायल हुए थे। हमारा स्टाफ जब भी मौके पर पहुंचता है तो वहां भीड़ मिलती है, लेकिन मदद करने वाले बहुत कम आते हैं। 40-50 प्रतिशत केस में बोलने के बाद भी स्टाफ की मदद कोई नहीं करता।

पुलिस का डर है कारण

लोगों से जब मदद ना करने की बात पूछी गई तो अधिकतर ने पुलिस के पचड़े ना पडऩे की बात कही। इसके साथ ही लोग अन्य कारणों से भी घायलों की मदद नहीं करते। कुछ लोग खून या घायल देखकर उसकी मदद करने की हिम्मत हीं नहीं जुटा पाते।

पहला घंटा होता है गोल्डन अवर

गांधी मेडिकल कॉलेज के हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ आशीष गोहिया बताते हैं कि सड़क हादसे के बाद का एक घंटा गोल्डन ऑवर होता है। इस अवधि में घायल को इलाज मिल जाए तो जान बच सकती है। अगर लोग जागरूक हों तो आधे से ज्यादा मामलों में जान बचाई जा सकती है।

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