खतरे में राजधानी: हाइराइज बिल्डिंग्स में अग्निसुरक्षा की अनदेखी, इन बातों का रखें खास ख्याल

खतरे में राजधानी: हाइराइज बिल्डिंग्स में अग्निसुरक्षा की अनदेखी, इन बातों का रखें खास ख्याल

Deepesh Tiwari | Publish: Apr, 17 2019 12:16:43 PM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

फायर ब्रिगेड विभाग पर हाइड्रोलिक प्लेटफार्म 75 फीट ऊंचा,परमीशन 100 फीट से ऊंची बिल्डिंग्स की...

भोपाल@दिनेश भदौरिया की रिपोर्ट...

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की हाइराइज बिल्डिंग्स में अग्निसुरक्षा की घोर अनदेखी की जा रही है। मध्यप्रदेश में फायर एक्ट न होने से बेखौफ बिल्डर्स व प्रतिष्ठान स्वामी हाइराइज बिल्डिंग्स में अग्निसुरक्षा के वे आंतरिक इंतजाम नहीं करते, जो आग से बचाने को बहुत जरूरी हैं। वहीं फायर ब्रिगेड के पास हाइराइज बिल्डिंग्स में आग से निपटने संसाधन तक नहीं हैं।

जानकारी के अनुसार नगर निगम की फायर ब्रिगेड के पास एक ही 75 फीट ऊंचा हाइड्रोलिक प्लेटफार्म (लिफ्ट) है, जो तकरीबन 70 फीट ही खुलती है। जबकि भवन अनुज्ञा शाखा द्वारा परमीशन 100 फीट से ऊंची बिल्डिंग्स की दी जा रही है।

105-110 फीट ऊंचा हाइड्रोलिक प्लेटफार्म खरीदने की डिमांड वर्ष 2015 में तत्कालीन फायर अफसर आरके परमार के समय की गई थी, लेकिन नगरीय प्रशासन विभाग में मामला अटक गया था।


फायर ब्रिगेड के पास करीब 35 वर्ष पुराना एक ही हाइड्रोलिक प्लेटफार्म है, जिसका इस्तेमाल चार इमली जैसे इलाकों में ऊंचे पेड़ों की छंटाई या मटकी फोडऩे में किया जाता है।

हाइराइज बिल्डिंग्स की श्रेणी...
भवन अनुज्ञा शाखा के अधिकारी के अनुसार शहर में तीस मीटर से अधिक ऊंची बिल्डिंग्स को हाइराइज बिल्डिंग्स की श्रेणी में माना जाता है। ऐसी बिल्डिंग्स होशंगाबाद रोड, रायसेन रोड, कोलार रोड समेत शहरभर में हैं।

न्यू मार्केट जैसे भीड़ वाले इलाके में प्लेटिनम प्लाजा, पंचानन भवन, गैमन इंडिया जैसी हाइराइज बिल्डिंग्स हैं। अब तो बावडिय़ा कलां, कोलार आदि में भी कई हाइराइज बिल्डिंग्स तान दी गई हैं। इनमें किसी ऊपरी तल पर यदि आग लग जाए तो वहां तक हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म पहुंच ही नहीं सकता जिसके चलते जान-माल का नुकसान हो सकता है।

वहीं प्रदेश में फायर एक्ट लागू नहीं होने से रियल एस्टेट व्यवसायी और व्यापारिक प्रतिष्ठान वाले नहीं डरते हैं। उन्हें पता है कि फायर ब्रिगेड सिर्फ नोटिस ही दे सकता है, कोई कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकता। इसलिए वे मनमानी करते हैं।

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हम फायर सेफ्टी के लिए प्रतिष्ठान और कॉम्पलेक्स मालिकों को नोटिस दे सकते हैं और हमने दिए भी हैं। हमारे पास नोटिस देने के अलावा और कोई अधिकार नहीं है। कुछ लोग जवाब देते हैं और जो लोग नोटिस का जवाब नहीं देते, उनका हम कुछ नहीं कर सकते। अधिक ऊंचा हाइड्रोलिक प्लेटफार्म खरीदने के लिए प्रक्रिया चल रही है। आचार संहिता के बाद इसमें प्रगति होगी।
- रामेश्वर नील, फायर अफसर, नगर निगम

 

अपर्याप्त संसाधन...
शहर की 20 लाख की आबादी के लिए नगर निगम के फायर ब्रिगेड अमले के पास पर्याप्त संसाधन नहीं है। नगर निगम के मौजूदा बेड़े में 32 दमकल वाहन और 125 फायर फाइटर्स का स्टाफ है। यही कारण है कि छोटी सी आग विकराल रूप ले लेती है।


विभाग के पास दो क्रेन हैं वे भी बहुत पुरानी हैं, जिनमें एक कंडम गाडिय़ों को खींचने व दूसरी अतिक्रमण का सामान उठाने का काम करती है। वर्षों पुरानी क्रेन्स को रंग-रोगन करके चलाया जा रहा है। इसके सिवा केवल दस फायर स्टेशन हैं और एक आदमपुर छावनी में नई कचरा खंती के लिए अलग से बनाया गया है, जिसका पब्लिक के लिए कोई उपयोग नहीं।

ये है नियम!..
वैसे तो बताया जाता है कि नियम के अनुसार पचास हजार की आबादी पर एक फायर स्टेशन होना चाहिए। शहर की आबादी 20 लाख मानें तो शहर में चालीस फायर स्टेशन होने चाहिए और प्रत्येक फायर स्टेशन पर कम से कम दो-तीन दमकल होनी चाहिए।


ऐसे में कम से कम 60 दमकल की जगह अभी सिर्फ 32 दमकल ही राजधानी के फायर ब्रिगेड के पास हैं। रातीबड़, बैरसिया जैसे इलाकों में अग्नि हादसा होने पर पहुंचने में बहुत समय लगता है। चौक व न्यू मार्केट इलाके में अग्निकांड से निपटने के लिए यूनानी शिफाखाना के पास फायर स्टेशन है, जहां से टाटा 407 जैसी छोटी दमकल भी टैफिक जाम आदि के चलते समय पर नहीं पहुंच सकतीं।


इनकी जगह बोलेरो जैसी छोटी गाडिय़ां घनी आबादी और भीड़ भरे इलाकों के लिए अधिक कारगर हो सकती हैं। एकमात्र हाइड्रोलिक प्लेटफार्म (लिफ्ट) पुल बोगदा स्टेशन पर खड़ा रहता है। अति घने व हाइराइज बिल्डिंग्स पर भी यह पहुंच नहीं सकता। गांधीनगर पानी की टंकी व पॉलीटेक्निक चौराहे पर टॉवर पर चढऩे वालों तक यह प्लेटफार्म कम ऊंचाई के कारण नहीं पहुंच सका था।

हवा में उड़ा देते नोटिस
नगर निगम फायर ब्रिगेड द्वारा जारी किए जाने वाले नोटिस का 20-30 प्रतिशत प्रतिष्ठान ही जवाब देते हैं, बाकी अतिरिक्त समय मांगकर मामले को ठंडा कर देते हैं।

उल्लेखनीय है कि शहर में कमर्शियल एवं हाईराइज इमारतों का निर्माण किया जा रहा है, पर एनबीसी (नेशनल बिल्डिंग कोड) के प्रावधानों के मुताबिक आग से बचाव के आवश्यक उपायों की अनदेखी की जा रही है।

बिल्डिंग परमीशन में भवन बनने से पहले पूरा ड्राइंग दी जाती है और भवन पूरी करने पर भी कम्प्लीशन सर्टिफिकेट दिया जाता है। इन दोनों स्तरों पर अग्निसुरक्षा को जिम्मेदार एजेंसियां नजरअंदाज कर अनुमति देती हैं।

नोटिस तक ही सीमित रही थी कार्रवाई
27 दिसंबर 2017 को संत हिरदाराम कॉम्लेक्स मे हुए अग्निकांड में सौ से अधिक दुकानें खाक हो गई थीं, इससे करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ था।

इस अग्निकांड के बाद हरकत में आए नगर निगम ने राजधानी के अलग-अलग क्षेत्रों में फायर सेफ्टी के इंतजामों की तफ्तीश की थी, इस दौरान शहर के पांच सौ से अधिक कमर्शियल कॉम्पलेक्स एवं व्यापारिक प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी किए गए थे, पर इनमें से अधिकतर ने जवाब नहीं दिया है, जबकि शेष ने जवाब के लिए अतिरिक्त समय मांगा था।

फायर सेफ्टी के लिए जरूरी उपाय व्यापारिक प्रतिष्ठानों में नहीं किए गए हैं। संत हिरदाराम कॉम्पलेक्स में हुए अग्निकांड के बाद राजधानी में संचालित हो रहे कमर्शियल कॉम्पलेक्स के व्यापारिक प्रतिष्ठानों में सुरक्षा उपायों की जांच के लिए जोनवार टीम बनाई गई थीं।

इन्हें जोन एक से लेकर 19 तक में मौजूद व्यापारिक प्रतिष्ठानों की मौके पर पहुंचकर जांच करना थी। प्रत्येक टीम का प्रभारी का दायित्व भवन अनुज्ञा शाखा के सहायक यंत्री को सौंपा गया था। इस टीम में फायर ऑफिसर समेत वार्ड प्रभारियों को शामिल किया गया था। इन टीमों को दस दिन में रिपोर्ट प्रस्तुत करना थी, पर कार्रवाई महज नोटिस देने तक ही सीमित रही।

नहीं हो पा रहा मेंटेनेंस
हाइड्रोलिक प्लेटफार्म की ऊंचाई ऊंचाई 23 मीटर या 75 फीट है, जो 70 फीट या 21 मीटर तक ही खुलता है। वर्तमान समय में इसका इस्तेमाल मटकी फोडऩे या चार इमली जैसे क्षेत्रों में पेड़ों की छंटाई के लिए किया जाता है।

सूत्रों का कहना है कि अग्निशमन से परे हटकर किए अन्य कामों में हाइड्रोलिक प्लेटफार्म के प्रयोग के चलते मेंटेनेंस नहीं हो पा रहा है। आशंका है कि जरूरत पडऩे पर यह कारगर साबित न हो सके।

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