नवाब यहां करते थे मनोरंजन, आज भी मौजूद है वो विरासत

 नवाब यहां करते थे मनोरंजन, आज भी मौजूद है वो विरासत

भोपाल के शाहजहांनाबाद में आज भी गोलघर को नवाबी विरासत मानकर सहेजा गया है।


भोपाल। ठुमरी और दादरा पर गूंजतीं तारीफें, घुंघरूओं की झनकार और शेर-ओ-शायरी। कुछ ऐसा हुआ करता था भोपाल के गोलघर का नजारा। ये प्राचीन ईमारत नवाबी दौर में मनोरंजन के लिए मशहूर थी। भोपाल के शाहजहांनाबाद में आज भी गोलघर को नवाबी विरासत के रूप में सहेज कर रखा गया है। अब इसे खूबसूरत म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है पर गोलघर के किस्से आज भी भोपालियों के जुबां पर हैं।


नवाब शाहजहां बेगम ने 1868 से 1901 में गोलघर का निर्माण करवाया था। इस भवन में 18 दरवाजे हैं। इसमें ऊपर जाने के लिए गोल हिस्से में सीढिय़ां हैं। भवन की आकृति पूरी तरह गोल है। ऊपरी कक्ष में बड़ा सा गुंबद है। इतिहासकार और पुरातत्वविद जिनेद्र जैन बताते हैं कि नवाबी दौर में यहां फ्रांस से मंगवाया गया विशेष झूमर लगा था। गुंबद के अंदरूनी हिस्से में बैगनी, हरे और लाल रंग से महीन चित्रकारी की गई है। ऊपरी कक्ष में गोलाकार बरामदा है।

नवाब के लिए बजता था विशेष संगीत
नवाब शाहजहां के लिए यहां विशेष बैंड की व्यवस्था की गई थी। जिसके वाद्य यंत्र ऊपरी कक्ष में रखे गए थे। नवाब हर शाम यहां आकर संगीत सुना करते थे। इसके साथ वाले कमरे में बेगम का कार्यालय बनाया गया था। जहां वे महिलाओं की समस्याओं का निदान करतीं थीं।

सहेजी गईं है हर विरासत
गोलाघर में नवाबकाल की बहुत से कीमती चीजों को सहेज कर रखा गया है। यहां आज भी नवाब के लिखे शेर-ओ-शायरी, पत्र, बर्तन, तश्तरियां सम्हालकर रखीं गईं हैं। इसके अलावा नवाबी पेटिंग, बटुए और नक्काशी करने के औजार भी रखे हैं।


बेगम अपने कार्यालय में महिलाओं को नक् काशी और जरदोजी का काम सिखाया करती थीं। उनके इस्तेमाल में आने वाले सामानों को अब भी सम्हालकर रखा गया है। बेगम यहां महिलाओं को बटुए बनाना सिखाया करतीं थी। यह वही दौर है जब भोपाली बटुए ट्रेंड में आए।

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