VIDEO: 3 जोड़ी कुर्ते और साइकिल, ऐसी है Ex आईआईटियन की लाइफ

VIDEO: 3 जोड़ी कुर्ते और साइकिल, ऐसी है Ex आईआईटियन की लाइफ
alok sagar

आज हम आपको एक ऐसे आईआईटियन से मिलवा रहे हैं जिसके लग्जरी लाइफ का ऑप्शन था, लेकिन उसने सुकून के लिए संघर्ष का रास्ता चुना...गरीब आदिवासियों के लिए संघर्ष।

गौरव नौड़ियाल@भोपाल. एक आईआईटियन या आईआईटी प्रोफ़ेसर का नाम आने पर आपके जेहन में क्या आता है...लग्जरी लाइफस्टाइल, व्हाइट कॉलर जॉब, चमचमाती गाड़ी, बंगला और सुकून की जिंदगी...शायद यही न! लेकिन आज हम आपको एक ऐसे आईआईटियन से मिलवा रहे हैं जिसके पास ये सब पाने का ऑप्शन था, लेकिन उसने सुकून के लिए संघर्ष का रास्ता चुना...गरीब आदिवासियों के लिए संघर्ष।

आलोक सागर आईआईटी दिल्ली के पूर्व प्रोफ़ेसर हैं। वो पिछले दिनों अचानक से तब चर्चाओं में आए जब घोडाडोंगरी उपचुनाव के दौरान पुलिस ने उन्हें वैरीफिकेशन के नाम पर थाने बुलवा लिया। आलोक पिछले 26 सालों से आदिवासी बहुल गांव कोचामू में रह रहे हैं।


कोचामू राजधानी भोपाल से तकरीबन 165 किलोमीटर दूर बैतुल जिले में पड़ता है। करीब 750 की आबादी वाले इस गांव में आज तक बिजली नहीं पहुंची है और कभी बनाई गई कच्ची सड़क भी अब पगडंडी की तरह नजर आती है। गांव में शिक्षा के नाम पर प्राइमरी स्कूल है और ग्रामीणों का स्वास्थ्य फिलहाल भगवान भरोसे ही ठीक-ठाक है।

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आलोक 90 के दशक में आदिवासी श्रमिक संगठन के अपने साथियों के जरिए मध्यप्रदेश में पहुंचे और तब से यहीं रच-बस गए। उन्होंने 1966-71 में दिल्ली आईआईटी से बीटेक किया और फिर यहीं से वर्ष 1971-73 में एमटेक करने के बाद पीएचडी करने के लिए राइस यूनिवर्सिटी ह्यूस्टन का रुख कर लिया। पीएचडी के बाद उन्होंने डेढ़ साल यूएस में जॉब भी की और फिर 1980-81 में वापस भारत आकर दिल्ली आईआईटी में एक साल पढ़ाया भी।

नौकरी छोड़कर गांवों में काम करने के सवाल पर आलोक गंभीरता से जवाब देते हुए कहते हैं- 'जो समाज से लिया था वो अब लौटना भी तो है'। जब उनसे पूछा गया कि उनके पास किसी भी आम भारतीय से ज्यादा बेहतर विकल्प मौजूद थे तो इस पर वो कहते हैं- 'मुझे बचपन से ही कुदरत के करीब जाने में ख़ुशी मिलती थी और मैंने अपना रास्ता खुद चुना, लिहाजा मैं संतुष्ट हूँ।'



कभी देश के लिए आईआईटियन तैयार करने वाले आलोक के पास आज जमापूँजी के नाम पर 3 जोड़ी कुर्ते और एक साइकिल है। वो जिस आदिवासी के घर में पिछले 26 सालों से रह रहे हैं, उस घर में दरवाजे तक नहीं...दरवाजों के बारे में पूछने पर वो कहते हैं...इसकी जरुरत ही कहां है! रेंट के सवाल पर कहते हैं...हाँ थोड़ा-बहुत दे देता हूँ!

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आदिवासी श्रमिक संगठन के साथ मिलकर वो आदिवासियों के हक़-हकूकों के लिए पिछले लम्बे समय से संघर्ष कर रहे हैं। वो कई भाषाओँ के जानकार भी हैं। आप उस वक़्त थोड़ा हैरान हो सकते हैं जब आप उन्हें स्थानीय आदिवासियों की भाषा में संवाद करते हुए देखते हैं। सरकार किसानों और आदिवासियों के लिए योजनाएं चला रही है...इस पर वो कहते हैं 'मुझे तो ये सब नजर नहीं आता...हां अलबत्ता योजनाबद्ध ढंग से शोषण जरूर कर रही हैं।' बहरहाल आलोक के पास अपने सवाल है और वो कहते हैं कि गैरबराबरी खत्म होनी चाहिए और जिस समाज का वो सपना देखते हैं उसका उनके पास मॉडल भी है।

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