सिंधिया और शिवराज, राजनीति के मामा और महाराज

सिंधिया और शिवराज, राजनीति के मामा और महाराज

Shailendra Tiwari | Publish: Jan, 25 2019 03:52:45 PM (IST) | Updated: Jan, 25 2019 04:04:09 PM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

कुल मिलाकर साफ है जब दोनों नेता प्रदेश के भीतर अपनी राजनीति की संभावनाओं को बरकरार रखना चाह रहे हैं। उस समय में उन्हें देश की राजनीति में भेज दिया गया।

मध्यप्रदेश में पिछले दिनों खत्म हुए विधानसभा चुनाव में यही दो किरदार आमने—सामने थे। माफ करो महाराज...कैंपेन के सहारे भाजपा ने कांग्रेस की कैंपेन कमेटी के चेयरमैन और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया पर जोरदार हमला बोला था। जबकि पूरी कांग्रेस के निशाने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान थे। होना भी चाहिए था...आखिर सवाल उसी से पूछे जात हैं जिसके पास उन सवालों को हल करने का जिम्मा दिया गया होता है। शिवराज सत्ता में थे, ऐसे में सवालों के घेरे में उनको ही आना था। लेकिन एक बात पूरी तरह से साफ थी कि चुनाव सिंधिया और शिवराज के आस—पास ही हुआ था।

 

Scindia

कुल मिलाकर जिन दो नेताओं के इर्द—गिर्द पूरा विधानसभा चुनाव हुआ, वही दोनों नेता चुनाव खत्म होने के बाद प्रदेश की राजनीति के नेपथ्य में पहुंचा दिए गए। ज्योतिरादित्य सिंधिया कह सकते हैं कि उनका कद बढ़ाया गया है, आधे उत्तर प्रदेश का जिम्मा दिया गया है। पार्टी के भीतर महासचिव बनाया गया है। वहीं, इसके उलट शिवराज सिंह चौहान को भाजपा के भीतर ही कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं। उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। कहा जा सकता है कि दूसरा ऐसा कोई पद नहीं था, जिस पर उन्हें ले जाया जा सकता था। कुल मिलाकर साफ है जब दोनों नेता प्रदेश के भीतर अपनी राजनीति की संभावनाओं को बरकरार रखना चाह रहे हैं। उस समय में उन्हें देश की राजनीति में भेज दिया गया।

 

सिंधिया खेमा लोकसभा के बाद खुद को मुख्यमंत्री के तौर पर तलाश रहा है, जबकि शिवराज सिंह चौहान लोकसभा के दौरान ही खुद को प्रदेश का नेतृत्व बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। यह बात और है कि दोनों ही नेताओं को अपने अंदर से ही चुनौती मिल रही है। सिंधिया को कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के लोग नहीं चाहते हैं कि वह मध्यप्रदेश की राजनीति में रहकर कोई काम करें। जबकि शिवराज के खिलाफ काम करने वालों की फेहरिस्त लंबी है। इनमें कैलाश विजयवर्गीय से शुरुआत होती है और नरोत्तम मिश्रा, प्रहलाद पटेल, नरेंद्र सिंह तोमर समेत कई नेताओं से घूमती हुई राकेश सिंह पर आकर ठहर जाती है।

 

 

shivraj

लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि दोनों ही नेताओं के भीतर मध्यप्रदेश की राजनीति की संभावनाएं अभी बरकरार हैं। दोनों में समानताएं भी काफी हैं और असमानताएं भी, लेकिन राजनीति के नक्षत्र पर दोनों ही प्रभावी हैं। शिवराज को कुछ लोगों का घेरा पसंद है तो सिंधिया भी अपने सीमित सलाहकारों से बाहर नहीं आना चाहते। शिवराज का चेहरा जितना मध्यप्रदेश में लोकप्रिय है, उतना ही सिंधिया को भी पोस्टर बॉय माना जाता है। लेकिन संकट यही है कि दोनों ही नेता जमीन देखने और स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। शिवराज जहां मध्यप्रदेश में अपनी हिलती जमीन को स्वीकारने को तैयार नहीं थे तो वहीं सिंधिया अब भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि ग्वालियर—चंबल के बाहर भी मध्यप्रदेश है...जहां उन्हें अपना राजनीतिक रसूख तैयार करना है। ग्वालियर—चंबल के भीतर ही उन्हें दूसरे क्षत्रपों से चुनौती मिलती रहती है...उसका समाधान उन्हें खत्म करने में नहीं, बल्कि उन्हें अपना बनाने में है।

 

जब विधानसभा चुनावों के दौरान दोनों नेता एक दूसरे पर हमला बोल रहे थे...उस समय राजनीति को जानने वाले उन हमलों को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। वजह साफ थी...दोनों के रिश्ते हमेशा से शानदार रहे हैं। सिंधिया ने शिवराज की सियासत में मुश्किलें खड़ी नहीं की तो शिवराज ने भी उन्हें मध्यप्रदेश क्रिकेट की सियासत में कभी मुश्किलें खड़ी नहीं होने दी। भले ही इसके लिए उन्हें कैलाश से दुश्मनी मोल लेनी पड़ गई हो। गुना—अशोकनगर सीट पर भाजपा की चुनावी मेहनत कितनी होती है...हर कोई जानता है। कुल मिलाकर रिश्तों का यह ऐसा गठजोड़ है जो पीढ़ियों से चला आ रहा है। भाजपा और कांग्रेस के लोग बस उसे निभाते चल रहे हैं।

 

Scindia

 

खैर, पिछले दिनों ज्योतिरादित्य सिंधिया अचानक से शिवराज सिंह चौहान के नए बंगले पर पहुंच गए। अकेले में 20 मिनट बातचीत भी की। वैसे, कमलनाथ मुख्यमंत्री बनने से पहले और बाद में दो बार शिवराज से मुलाकात कर चुके हैं। ऐसे में सिंधिया की मुलाकात कोई बहुत चौंकाने वाली बात नहीं थी। लेकिन दोनों नेताओं का चुनाव के बाद एक बार फिर से साथ खड़े नजर आना यह जरूर बता गया कि सियासत की रैलियों में बोले जाने वाले शब्दों का कोई मोल नहीं होता है...यह तो महीने भर के लिए होती हैं...बाद में तो सबको गले मिलकर ही चलना है। खैर, दोनों नेताओं में अब मध्यप्रदेश से आगे देश की राजनीतिक संभावनाएं तलाशी जा रही हैं...ऐसे में तय है कि आने वाला वक्त दोनों नेताओं के लिए चुनौतीभरा होगा। कहीं न कहीं यह मुलाकातें इन्हीं संभावनाओं का विस्तार भर हैं। आखिर दोनों के दर्द वही हैं और दर्द का सिला भी एक सा है। उन्हें उस वक्त में झटका मिला, जब उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी। ऐसे में भोपानी शायद वशीर बद्र की लाइन याद आ जाती है।

 

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।
अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो।

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