scriptJaw operation done in AIIMS for snoring | 34 साल से खर्राटों के कारण नहीं सो रहा था युवक, इसलिए कराया जबड़े का ऑपरेशन | Patrika News

34 साल से खर्राटों के कारण नहीं सो रहा था युवक, इसलिए कराया जबड़े का ऑपरेशन


-एम्स भोपाल में हुआ नींद के विकारों को दूर करने का जटिल ऑपरेशन, प्रदेश का पहला मामला

भोपाल

Published: May 04, 2022 01:18:39 pm

भोपाल। अगर किसी को नींद न आने या नींद में खर्राटे लेने की बीमारी है और उसे कहा जाए कि इसके लिए जबड़े का ऑपरेशन करना पड़ेगा तो चौकना लाजिमी है, लेकिन एम्स भोपाल में ऐसा ही एक जटिल ऑपरेशन कर मरीज की नींद की समस्या को दूर किया गया। यह प्रदेश का पहला मौका है जब नींद से जुड़े विकारों के लिए जबड़े का ऑपरेशन किया गया। दरअसल, राजधानी के कटारा हिल्स में रहने वाले 35 साल के युवक को लगभग बचपन से ही नींद में सांस अटकने और खर्राटे लेने की बीमारी थी।
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कई सालों तक डॉक्टरों को दिखाने के बाद जब मर्ज दूर नहीं हुआ तो युवक एम्स के स्लीप स्टडी लैब में पहुंचा। यहां जांच के बाद पता चला कि युवक के निचले जबड़े में जन्मजात विकार के चलते नींद में खलल पड़ रहा है। तमाम जांचों के बाद युवक का ऑपरेशन किया गया। एम्स के मैक्सिजोफेशियल सर्जन डॉ. अंशुल राय ने बताया कि मरीज की स्लीप स्टडी की गई, जिसमें गंभीर एपनिया-हाइपनिया पाया गया। इलाज के लिए मरीज को स्लीपिंग डिवाइस लगाई गई लेकिन इससे भी मरीज को कोई फायदा नहीं हुआ। इसके बाद मरीज का सेफैलोमेट्रिक टेस्ट किया गया। जिसमें रोगी का निचला जबड़ा विकृत पाया गया।
जबड़े से दब रही थी सांस की नली

डॉ. अंशुल राय ने बताया कि मरीज का निचला जबड़ा अपेक्षाकृत छोटा और पीछे की तरफ खिसका हुआ था। इससे मरीज का एयर वे यानि सांस की नली दब रही थी। सांस की नली का मुंह छोटा होने के कारण सांस लेने में तकलीफ होती थी। जांच के बाद मरीज के निचले जबड़े की ऑर्थोग्नैथिक सर्जरी कर सही जगह पर फिट किया गया। चिकित्सीय भाषा में इसे मैंडिबल के बाइलेटरल सैजिटल स्प्लिट ओस्टियोटॉमी कहा जाता है।
पहली बार हुई जटिल सर्जरी

डॉ. राय ने बयया कि यह पहला मौका है जब इस तरह का ऑपरेशन किया गया। लोअर जॉ एडवांस्ड सर्जरी सांस लेने की जगह को बढ़ाती है और खर्राटों को कम करती है। उन्होंने बताया कि इस ऑपरेशन में स्लीप डिजीज एक्सपर्ट डॉ. अभिषेक गोयल के साथ ऑथोर्डेंटिस्ट, निश्चेतना विशेषज्ञ भी मौजूद रहे। ऑपरेशन के कुछ दिन बाद जब मरीज का स्लीप एपनिया टेस्ट किया गया तो स्कोर 70 फीसदी तक कम पाया गया।

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