जल्लीकट्टू जैसे खतरनाक हैं ये मेले, जान की परवाह नहीं करती यह भीड़

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद तमिलनाडू में जलीकट्टू के आयोजन करने को लेकर बवाल मचा हुआ है, लेकिन जलीकट्टू अकेला ऐसा विवादास्पद फेस्टिवल नहीं है। मध्यप्रदेश में हिंगोट और गोटमार मेले को भी प्रशासन नहीं रोक पाया है।


भोपाल। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद तमिलनाडू में जलीकट्टू के आयोजन करने को लेकर बवाल मचा हुआ है, लेकिन जलीकट्टू अकेला ऐसा विवादास्पद फेस्टिवल नहीं है। मध्यप्रदेश में हिंगोट और गोटमार मेले को भी प्रशासन नहीं रोक पाया है। इन दोनों ही मेलों में लोगों की जान पर तक बन आती है। यह मेले इतने खतरनाक हैं कि प्रशासन इनके शुरू होने से पहले ही स्थानीय लोगों को इसमें शामिल नहीं होने की अपील करता है।

यह होता है जलीकट्टू
तमिलनाडु का 400 साल पुराना पारंपरिक खेल है Jallikattu(जल्लीकट्टू)। यह खेल फसलों की कटाई के मौके पर पोंगल के दौरान खेला जाता है। इस खेल में 400 किलो वजनी सांड के सींगों पर सिक्के या नोट फंसा दिए जाते हैं और फिर उन्हें भड़काने के लिए शराब पिलाई जाती है। इसके बाद उन्हें भीड़ में छोड़ दिया जाता है। इसके बाद लोग सांड के सींगों को पकड़कर उसे काबू करने का प्रयास करते हैं। इसमें जान भी जाने का खतरा रहता है। विजेता को नकद पुरस्कार भी दिया जाता है। सांडों को शराब पिलाकर उसकी आंघों में मिर्च पाउडर तक डाल दिया जाता है, जिससे वे जमकर भड़के, दौड़ लगाए और खेल का मजा दोगुना हो जाए। ऐसा जानलेवा आयोजन तमिलनाडू के मदुरैय में होता है।


मध्यप्रदेश में ही है जलीकट्टू की तरह मौत का खेल
मध्यप्रदेश में कई परंपराएं आज भी अपने मूल स्वरुप में हैं। ऐसा ही एक मेला छिंदवाडा जिले में पोला पर्व के दूसरे दिन खेला जाता है, जिसे गोटमार कहते हैं। गोटमार मेले में खिलाड़ी नदी के बीच में गाड़े गए झंडे को बचाने और गिराने की जद्दोजहद में एक-दूसरे पर पथराव करते हैं। 300 सालों से चली आ रही इस परंपरा का खूनी खेल इस बार भी चला। इस दौरान 585 से भी ज्यादा लोग घायल हुए। कई लोगों को इनमें गंभीर चोटें भी आई। 2 लोगों को गंभीर स्थिति में नागपुर भी रेफर किया गया है।



क्यों होता है गोटमार
गोटमार मेले का इतिहास 300 साल पुराना बताया जाता है। जाम नदी के दोनों ओर के लोगों के बीच खेले जाने वाले इस खूनी खेल के पीछे एक प्रेम कहानी जुडी हुई है। पांढुर्ना का एक लड़का नदी के दूसरे छोर पर बसे गांव की एक लड़की से प्यार करता था। उनकी इस प्रेमकहानी पर दोनों गांवों के लोगों को एतराज था। एक दिन सभी के विरोध को झेलते हुए लड़का लड़की को गांव से भागकर लौट रहा था। अभी दोनों ने आधी नदी तक का ही सफर किया था कि दोनों ओर के ग्रामीणों को इसकी सूचना मिल गई और प्रेमीजोड़े पर दोनों तरफ से पत्थरों की बरसात होने लगी। इस पथराव में दोनों की मौत नदी के मझधार में हो गई।



मध्यप्रदेश में खेला जाता है हिंगोट
इंदौर के पास खेले जाने वाले हिंगोट मेला दीपावली के अगले दिन गौतमपुरा कस्बे में विक्रम संवत की कार्तिक शुक्ल प्रथमा को शुरू होता। इस दौरान दो गांवों के लोग एक-दूसरे पर जलता हुआ हिंगोट फेंकते हैं। गौतमपुरा के योद्धाओं के दल को ‘तुर्रा’नाम दिया जाता है, जबकि रुणजी गांव के लड़ाके ‘कलंगी’ दल की अगुवाई करते हैं।


यह है हिंगोट
‘हिंगोट’ दरअसल आंवले के आकार वाला एक जंगली फल है। जिसकी पैदावार देपालपुर इलाके में होती है। फल का गूदा निकालकर इसे खोखला कर लिया जाता है। फिर इसमें कुछ इस तरह बारूद भरी जाती है कि आग दिखाते ही यह किसी अग्निबाण की तरह किसी को भी लग सकता है।


एक व्यक्ति की चली गई थीं आंख
परंपरागत हिंगोट युद्ध में एक व्यक्ति की आंख जाने के बाद हाई कोर्ट में लगी जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि परंपरा में यदि कमी नजर आए तो उसे सुधारो। परंपरागत रूप से हाल ही में हुए हिंगोट युद्ध में करीब 60 से अधिक लोग घायल हुए थे और एक व्यक्तिने अपनी आंख गंवा दी थी।

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Manish Gite
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