तंत्र-मंत्र की दुनिया में फल-फूल रहा अंधविश्वास का दानव


उज्जैन. पग पायला (पैर के बल जन्मे) को सिद्ध कर लो तो खजाना मिल जाता है... इतने नाखूनी कछुआ मिल जाए तो नोटों की बारिश हो सकती है... वगैरह-वगैरह। तंत्र की दुनिया में ऐसे दावे करने वाले बहुत हैं, लेकिन 60 वर्ष से इस अबूझ दुनिया के हिस्से बनकर रह रहे कपालिक महाकाल भैरवानंद सरस्वती स्वयं इन्हें खारिज करते हैं और इसे अंधविश्वास बताते हैं।

महाकाल दर्शन व सिंहस्थ को लेकर कपालिक महाकाल भैरवानंद सरस्वती (मां कामाख्या आश्रम, जगजीतपुर हरिद्वार) शहर आए हैं। अमूमन नरमुंड व काला चोगा पहनने वाले कथित तांत्रिक टोने-टोटके व नोटों की बारिश कराने जैसी बातें ही करते हैं, लेकिन कपालिक बाबा बिरले हैं। वह तंत्र साधना की वास्तविक परिभाषा बताते हुए इसके नाम पर फैले अंधविश्वास को खारिज कर समाज में जागरूकता बढ़ाते हैं। उनके अनुसार परमात्मा की आराधना जो संस्कृत में की जाती है और उन मंत्रों को जो क्रियात्मक स्वरूप दिया जाता है, वही तंत्र है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य ठीक रहा तो इस बार भी वे सिंहस्थ में कैंप लगाएंगे। फिलहाल वे एक होटल में ठहरे हुए हैं।

नहीं मिला दूसरा कपालिक
बाबा के अनुसार बद्रीनाथ में कपालेश्वर है। इसी से कपाली बने। कपाली वह होगा, जो पृथ्वी पर घूमता रहेगा, उग्र होगा, दुनिया से मेल-मिलाप नहीं रखेगा। कठोर जीवन के कारण कपाली कम होते गए और फिर काल मुखास आए। यह भयानक दिखते थे, लेकिन जहां कपालिक होता है, वहां से चले जाते हैं। इनके बाद कालाचार्य आए। यह थोड़े विनम्र थे।

इनके बाद अघोरी आए, जो लोवेस्ट स्टेटस ऑफ तांत्रिक है। दुर्भाग्य से दुनिया में अघोरी का नाम ही ज्यादा है। बाबा के अनुसार काला जादू, पीला जादू जैसी बातें कर कुछ वर्षों में तंत्र को बदनाम किया गया है। बाबा के अनुसार शायद वह अब इकलौते कपालिक हैं, क्योंकि करीब 30 वर्ष में उन्हें कोई कपालिक नहीं मिला। वह इसे आगे बढ़ाना चाहते हैं। सिंहस्थ में सरकार द्वारा सिर्फ अखाड़ों को महत्व देने को वे ठीक नहीं मानते।

सिंहस्थ में लावारिस शवों से तांत्रिक साधना करते हैं?
तीन साधना- श्मशान साधना, चिता साधना और शव साधना होती है। इसमें शव साधना अति विशिष्ट है। साधना एकांत में होती है। सिंहस्थ में शव साधना नहीं होती। ऐसा कार्य करना समाज हित में नहीं है।

आत्मा, भूत-प्रेत होते हैं?
चेहरे पर तो मैं कहूंगा नहीं होते हैं, लेकिन जब होते हैं तो फिर कोई साधक ही इनसे बचा सकता है। अधिकांश मामलों में मैं कहूगा,दिमागी बीमारी होती है और मनोचिकित्सक से मिलना चाहिए।

उज्जैन तंत्र क्रिया के लिए प्रमुख
उज्जैन कालों के काल महाकाल की नगरी है। यहां स्पेस और टाइम दोनों खत्म हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में परमात्मा से मिलन होता है।
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gaurav nauriyal
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