BDAY SPECIAL : किशोर दा के जन्मदिन पर जानिए उनसे जुड़े कुछ अनसुने किस्से

किशोर की ही अंतिम इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार खंडवा में किया जाए, उनकी अंतिम इच्छा पूरी तो हुई, लेकिन जिंदादिली के साथ खंडवा में अपनो के बीच और माल

By: rishi upadhyay

Published: 03 Aug 2017, 11:23 AM IST

भोपाल। 4 अगस्त को एक ऐसी शख्सियत का जन्मदिन है, जिसके गीतों के शौकीन आज भी उनकी आवाज के मुरीद हैं। किशोर की ही अंतिम इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार खंडवा में किया जाए, उनकी अंतिम इच्छा पूरी तो हुई, लेकिन जिंदादिली के साथ खंडवा में अपनो के बीच और मालवा की संस्कृति के बीच बसने की उनकी ख्वाहिश पूरी न हो सकी। आज सभी संगीत प्रेमी यही कहते हैं कि आज किशोर दा होते तो बात कुछ और होती। वे खंडवा स्थित उनके बंगले को देखने जरूर आते हैं।

 

4 अगस्त को इस महान गायक किशोर कुमार का जन्म दिन है। खंडवा में उनके बंगले में गांगुली सदन में प्रवेश करते ही ऐसा आभास होता है कि शायद किशोर यहीं-कहीं गुनगुना रहे हैं। mp.patrika.com आपको बताने जा रहा है उनके जीवन से जुड़े कुछ किस्से, जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं।

किशोर की यादें
1. आभास कुमार गांगुली था किशोर का असली नाम।
2. खंडवा के जिस बंगले में उनका जन्म हुआ था, वह बंगला आज भी है, लेकिन जर्जर हालत में है।
3. बंगले में वह पलंग भी है जिस पर उनका जन्म हुआ था। इसके अलावा वे तमाम चीजें हैं जिनके साथ किशोर कुमार बचपन में खेला करते थे।
4. किशोर कुमार ने 13 अक्टूबर को 1987 में अंतिम सांस ली थी।
5. किशोर कुमार बगैर फीस लिए कोई भी गाना नहीं गाते थे।
6.दही-बड़े खाने के लिए चले आते थे खंडवा।
7. अटपटी बातों के वे चटपटे अंदाज में जवाब देते थे। नाम पूछने पर वे बताते थे रशोकि रमाकु।

 

सिर्फ एक फिल्म के लिए नहीं लिए थे पैसे
भारतीय फिल्मों के गायक किशोर कुमार के बारे में इस बात को लेकर कई किस्से मशहूर हैं कि वह फीस लिए बगैर अपना हुनर कभी खर्च नहीं करते थे। लेकिन, यह वाकया बहुत कम लोग जानते होंगे कि फिल्मकार सत्यजीत रे के मशहूर बांग्ला शाहकार चारूलता के लिए 1964 में उन्होंने गाने के एवज में बतौर पारिश्रमिक एक पाई तक नहीं ली थी।

पोहे-जलेबी के थे शौकीन
किशोर कुमार मायानगरी मुंबई में जरूर बस गए,लेकिन उनका दिल आखिरी सांस तक खंडवा के लिए धड़कता रहा। यहां के दही बड़े और पोहे और दूध-जलेबी खाने के लिए हमेशा उत्सुक रहते थे।


देखरेख के अभाव में हो गया खंडहर
खंडवा का दुनिया में नाम रोशन करने वाले किशोर दा का बंगला इतना जर्जर हो चुका है कि कभी-भी भरभराकर गिर सकता है। देखरेख न होने के कारण किशोर दा का यह जन्म स्थान खुद मरणासन्न स्थिति में पहुंच गया है। कुछ दीवार ढह गई हैं, वहीं खिड़की दरवाजे टूटे-फूटे हैं और सिर्फ लटके हुए हैं। छतों में लगी सागौन की लकड़ियां टूटकर लटकी हुई हैं।

किशोर के कारण बन गई है यह धरोहर
किशोर दा के बचपन से जुड़ी चीजें आज भी बंगले में रखी हुई हैं। जिस कमरे में किशोर दा का जन्म हुआ था, वह पलंग आज भी रखा हुआ है। जो धूल खा रहा है। प्रथम तल पर जाने के लिए लकड़ी की सीढ़ियां बनी थी, जो क्षतिग्रस्त हो गई है। बंगले के आसपास के दुकानदार खराब सामान यहीं पटक जाते हैं।

 

वो कहते हैं- गिरने दो दीवारें
नगर निगम के रिकॉर्ड में किशोर कुमार का बंगला उनके पिता कुंजीलाल गांगुली के नाम पर है। बंगले पर करीब 42 सालों से चौकीदारी करने वाले बुजुर्ग सीताराम बताते हैं कि कई बार मुंबई मे रहने वाले किशोर के परिजनों को बंगले का रखरखाव करने के लिए सूचना दी जाती गई, लेकिन किसी ने भी रुचि नहीं ली। कुछ माह पहले जब बंगले की दीवार गिरने की सूचना भेजी गई तो वहां से कहा गया कि गिर जाने तो। बांबे बाजार स्थित इस बंगला 7655 वर्ग फीट में बना हुआ है।

तो बिक जाएगी किशोर की प्रॉपर्टी
रेलवे स्टेशन के सामने बांबे बाजार स्थित किशोर कुमार की यह प्रॉपर्टी खरीदने के लिए शहर के कुछ बिल्डर्स सक्रिय हो गए हैं। शहर के बिल्डर्स ने कुछ दिनों पहले मुंबई में किशोर के परिजनों से चर्चा की थी। बताया जा रहा है कि इसके लिए 15 करोड़ रुपए तक सौदा हो सकता है।

 

बंगले को म्यूजिम बनाए MP सरकार
दूसरी ओर किशोर के फैंस चाहते हैं कि इस बंगले को स्मारक या संग्रहालय बना देना चाहिए। जो किशोर से जुड़ी जानकारी यहां दें सके। इसके अलावा यहां संगीत की बारीकियां सिखाने के लिए भी व्यवस्था की जा सकती है। MP सरकार को इस भवन को अपने हाथ में ले लेना चाहिए।

 

बंगले में है दस दुकानें
बांबे बाजार रोड स्थित इस बंगले में कुल दस दुकानें हैं। जिसमें से केवलराम दूधगली मार्ग पर चार हैं, जिसमें मोबाइल और अंडे की दुकानें हैं। इन दुकानों से मात्र 1200 रुपए किराया लिया जाता है। यह किराया अनूप कुमार के पुत्र अर्जुन कुमार लेते हैं। चौकीदार सीताराम ने बताया कि इस किराए में से ही मुझे भी डेढ़ हजार रुपए महिने के हिसाब से दे दिया जाता है।

 

नम आखों से किया था विदा
13 अक्टूबर 1987 को किशोर विदा हुए तो उनके अंतिम संस्कार के दौरान हर चौराहे पर उन्हीं के गीतों के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई थी। यह गीत सुनकर सभी संगीत प्रेमियों की आंखें नम हो गई थीं। इस दिन पूरा शहर उनकी अंतिम यात्रा में आंसु बहा रहा था।

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